बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा – हमारी हिन्दी यात्रा -डॉ. वर्षा सिंह,सागर

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
हमारी हिन्दी यात्रा
-डॉ. वर्षा सिंह

मेरे बचपन में स्मृतियों में यह स्मृति अभी भी ताज़ा है। मध्यप्रदेश के पन्ना नगर में स्थित हमारे निवास हिरणबाग़ में हमारे पड़ोस में रहने वाले मेरे बाल मित्र अनंत और अजय शेवड़े खेलने जाने से पहले अपनी मां से कहा करते – ‘आई, मी खेळायला जाऊ शकतो का?’ ‘आई, मी जातो’ या ‘आई, मी गो’ तब मेरी समझ में नहीं आता कि ये हमारी तरह क्यों नहीं बोलते ! जो हम बोलते हैं, ये उससे अलग क्यों बोलते हैं? तब मेरे नाना ठाकुर श्यामचरण सिंह जी, जो स्वयं भाषाविद एवं साहित्यकार थे, मुझे समझाते कि ‘वे लोग महाराष्ट्रियन हैं, उनकी भाषा मराठी है इसलिए वे मराठी बोलते हैं, और हम मध्यप्रदेश के हैं हमारी भाषा हिन्दी है इसलिए हम हिन्दी बोलते हैं।’ तब मैं पूछती कि उनकी और हमारी पाठ्यपुस्तकें तो एक जैसी हैं। उनमें तो हिन्दी ही है। तब नाना जी कहते कि ‘चूंकि हमारे मध्यप्रदेश की राजभाषा हिन्दी है, इसलिए यहां सभी को हिन्दी में पढ़ाया जाता है।’ उन दिनों भाषा संबंधी ये सारी बातें मेरी समझ में कम ही आती थीं। लेकिन धीरे-धीरे स्कूली शिक्षा ग्रहण करते हुए मैं मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा में फ़र्क समझने लगी।
बाद के दिनों में अपने अध्ययन काल के दौरान बी.एससी. तक हिन्दी मीडियम और फिर एम.एससी. अंग्रेजी मीडियम से करने के साथ-साथ नाना जी, मामा कमल सिंह और हिन्दी की प्रतिष्ठित साहित्यकार अपनी माताजी डॉ. विद्यावती ‘मालविका’ के द्वारा दिए गए संस्कारों के कारण मैं भी हिन्दी में साहित्य सृजन करने लगी थी। साथ ही उर्दू, अंग्रेजी पढ़ने और बुंदेलखंड की निवासी होने के कारण आम बोलचाल में बुंदेली बोली बोलने के बावजूद हिन्दी भाषा से मुझे बेहद लगाव पहले की तरह आज भी है। मेरे लिए हर दिन हिन्दी का दिन है। जी हां, यूं तो हिन्दी 365 दिन मेरी ही नहीं वरन् हर हिन्दीभाषी, हिन्दीप्रेमी की अपनी भाषा है किन्तु प्रत्येक वर्ष सितम्बर मास में हम इसकी समग्रता का आकलन करते हुए हिन्दी मास मनाते हैं, साथ ही हिन्दी पखवाड़ा और हिन्दी दिवस भी।
तो आइए पहले चर्चा करें कि आखिर भाषा किसे कहते हैं। भाषा अभिव्यक्ति का माध्यम होती है अर्थात् भाषा वह साधन है, जिसके द्वारा मनुष्य बोलकर, सुनकर, लिखकर अथवा पढ़कर अपने मनोभावों अथवा विचारों का आदान-प्रदान करता है। दूसरे शब्दों में यदि कहा जाए तो जिस साधन के द्वारा हम अपने भावों को लिखित अथवा कथित रूप से दूसरों को समझा सके और दूसरों के भावों को समझ सकें, उसे भाषा कहते है।
अब बात आती है मातृभाषा, राजभाषा और राष्ट्रभाषा में अंतर की, तो जन्म से हम जिस भाषा का प्रयोग करते हैं वही हमारी मातृभाषा है। मातृभाषा के जरिए ही हमें हमारे संस्कार एवं व्यवहार का ज्ञान होता है। और जहां तक राजभाषा की बात है तो राजभाषा का शाब्दिक अर्थ है—समस्त राजकीय कार्यों में प्रयुक्त भाषा अर्थात् जन-जन की भाषा । वैसे देखा जाए तो राजभाषा एक संवैधानिक शब्द है, जिसकी परिभाषा इस प्रकार से दी जा सकती है कि – सामान्य शासन-प्रशासन, न्याय-प्रक्रिया, संसद-विधान मंडल एवं सरकारी कार्यालयों में प्रयोग हेतु संविधान द्वारा स्वीकृत भाषा एवं देवनागरी लिपि तथा भारतीय अंकों, जो कि अंतरराष्ट्रीय अंकों के रूप में मान्य हैं, का रूप ही राजभाषा है।
जबकि राष्ट्रभाषा वह भाषा है जो एक पूरे राष्ट्र अथवा देश द्वारा समझी, बोली जाती है; तथा उस राष्ट्र की संस्कृति से संबंधित होती है। यह पूरे देश की होती है। राष्ट्रभाषा राष्ट्रीय एकता एवं अंतर्राष्ट्रीय संवाद सम्पर्क के लिए आवश्यक होती है। एक राष्ट्र में समस्त राष्ट्रीय तत्वों को व्यक्त करने वाली भाषा जो राष्ट्र में भावनात्मक एकता कायम रखने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हो राष्ट्रभाषा है। भारत एक ऐसा बहुभाषा-भाषी राष्ट्र है, जहां समृद्ध संस्कृति की विशाल परंपरा है, जो यहां की विभिन्न भाषाओं के माध्यम से अभिव्यक्त होती है। वस्तुतः स्वतंत्रता संग्राम के दौरान राष्ट्रभाषा की आवश्यकता महसूस हुई। और इस आवश्यकता की पूर्ति हिंदी ने की। यही कारण है कि हिंदी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान परोक्ष रूप से राष्ट्रभाषा बनी। आज हिन्दी भाषा विश्व की तीसरी और भारत में यह सबसे अधिक बोले जाने वाली भाषा है। इसके मातृ भाषा के रूप में बोलने वालों की संख्या 50 करोड़ से भी अधिक है। यह भारत में 22 आधिकारिक भाषाओं में से एक है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी देश की एकता के लिए यह आवश्यक मानते थे कि अंग्रेजी का प्रभुत्व शीघ्र समाप्त हो और हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा मिल सके। हिन्दी शब्द का सम्बंध संस्कृत शब्द सिंधु से माना जाता है। ‘सिंधु’ सिंध नदी को कहते थे और उसी आधार पर उसके आस-पास की भूमि को सिन्धु कहने लगे। यह सिंधु शब्द से ‘हिंदू’, हिंदी और फिर ‘हिंद’ हो गया। बाद में हिन्दी से धीरे-धीरे भारत के अधिकाधिक भागों के लोग परिचित होते गए और हिन्दी भारत की पहचान बन गई। हिन्दी विश्व की एक प्रमुख भाषा है एवं भारत की राजभाषा है। यह हिंदुस्तानी भाषा की एक मानकीकृत रूप है जिसमें संस्कृत के तत्सम तथा तद्भव शब्दों का प्रयोग अधिक है और अरबी-फ़ारसी शब्द कम हैं। हिंदी संवैधानिक रूप से भारत की राजभाषा और भारत की सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है।
भाषा विद्वान यह मानते हैं कि संसार का सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद है। ऋग्वेद से पहले भी संभव है कोई भाषा विद्यमान रही हो परन्तु आज तक उसका कोई लिखित रूप नहीं प्राप्त हो पाया। संस्कृत सबसे प्राचीनतम भारतीय भाषा है और क्रमानुसार संस्कृत से पाली, पाली से प्राकृत, प्रकृत से अपभ्रंश, अपभ्रंश से अवहट्ठ और अवहट्ट से प्राचीन/प्रारम्भिक हिन्दी का विकास हुआ है।
संस्कृतकालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा समय के साथ धीरे-धीरे परिवर्तित हो कर लगभग 500 ई.पू. के बाद तक बहुत बदल गई, जिसे ‘पाली’ कहा गया। महात्मा गौतम बुद्ध के समय में पाली लोक भाषा थी और उन्होंने पाली के माध्यम से ही अपने उपदेश दिए जो ‘त्रिपिटक’ में संग्रहीत हैं। संभवतः यह पाली भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। पहली ईसवी तक आते-आते पाली भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे प्राकृत की संज्ञा दी गई। इसका काल पहली ई. से 500 ई. तक है। आगे चलकर, प्राकृत भाषाओं के क्षेत्रीय रूपों में अपभ्रंश भाषाएं प्रतिष्ठित हुईं। इनका समय 500 ई. से 1000 ई. तक माना जाता है। अपभ्रंश भाषा साहित्य के मुख्यतः दो रूप मिलते है- पश्चिमी और पूर्वी। अनुमानतः 1000 ई. के आसपास अपभ्रंश के विभिन्न क्षेत्रीय रूपों से आधुनिक आर्य भाषाओं का जन्म हुआ। हिन्दी में साहित्य रचना का कार्य 1150 या इसके बाद आंरभ हुआ। कालांतर में 9 सितंबर 1850 को बनारस में जन्में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाते हैं।
किसी भी राष्ट्र की उपलब्धियों को संग्रहित करने में राष्ट्रभाषा की महती भूमिका रहती है। राष्ट्रभाषा सामाजिक, सांस्कृतिक स्तर पर देश को जोड़ने का काम करती है अर्थात् राष्ट्रभाषा की प्राथमिक शर्त देश में विभिन्न समुदायों के बीच भावनात्मक एकता स्थापित करना है। राष्ट्रभाषा का प्रयोग क्षेत्र विस्तृत और देशव्यापी होता है। राष्ट्रभाषा सारे देश की सम्पर्क–भाषा होती है। इसका व्यापक जनाधार होता है। राष्ट्रभाषा हमेशा स्वभाषा ही हो सकती है क्योंकि उसी के साथ जनता का भावनात्मक लगाव होता है। राष्ट्रभाषा का स्वरूप लचीला होता है और इसे जनता के अनुरूप किसी रूप में ढाला जा सकता है।
समाजोत्थान के लिए समर्पित ब्रह्म समाज के संस्थापक राजा राममोहन राय ने लगभग दो शताब्दी पूर्व 1828 ई में कहा था कि इस समग्र देश की एकता के लिए हिंदी अनिवार्य है। इसी तरह 1875 ई. में आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानंद सरस्वती गुजराती भाषी थे एवं गुजराती तथा संस्कृत के अच्छे जानकार थे। हिंदी का उन्हें सिर्फ़ कामचलाऊ ज्ञान था, पर अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने के लिए तथा देश की एकता को मज़बूत करने के लिए उन्होंने अपना सारा धार्मिक साहित्य हिंदी में ही लिखा। उनका कहना था कि हिंदी के द्वारा सारे भारत को एक सूत्र में पिरोया जा सकता है। वे इस ‘आर्यभाषा’ को सर्वात्मना देशोन्नति का मुख्य आधार मानते थे। उन्होंने हिंदी के प्रयोग को राष्ट्रीय स्वरूप प्रदान किया। वे कहते थे कि उनकी आँखें उस दिन को देखना चाहती हैं, जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब भारतीय एक भाषा समझने और बोलने लग जाएंगे।
अरविन्द दर्शन के प्रणेता अरविन्द घोष का विचार था कि – ‘लोग अपनी–अपनी मातृभाषा की रक्षा करते हुए सामान्य भाषा के रूप में हिंदी को ग्रहण करें, तो हिन्दी सम्पर्क भाषा का दर्जा पा लेगी।’
थियोसोफ़िकल सोसाइटी की संचालिका एनी बेसेंट ने भी हिन्दी के महत्व को व्याख्यायित किया था कि – ‘भारतवर्ष के भिन्न–भिन्न भागों में जो अनेक देशी भाषाएँ बोली जाती हैं, उनमें एक भाषा ऐसी है जिसमें शेष सब भाषाओं की अपेक्षा एक भारी विशेषता है, वह यह कि उसका प्रचार सबसे अधिक है। वह भाषा हिंदी है। हिंदी जानने वाला आदमी सम्पूर्ण भारतवर्ष में यात्रा कर सकता है और उसे हर जगह हिंदी बोलने वाले मिल सकते हैं। भारत के सभी स्कूलों में हिंदी की शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए।’
1917 ई. में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा, ‘यद्यपि मैं उन लोगों में से हूँ, जो चाहते हैं और जिनका विचार है कि हिंदी ही भारत की राजभाषा हो सकती है।’ तिलक ने भारतवासियों से आग्रह किया कि वे हिंदी सीखें।
हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने के पक्षधर लोकसभा के प्रथम उपाध्‍यक्ष एम अनंतशयनम अय्यंगर दक्षिण भारतीय एवं अहिन्दी भाषी होते हुए भी मानते थे कि – ‘अहिंदी भाषा-भाषी प्रांतों के लोग भी सरलता से टूटी-फूटी हिंदी बोलकर अपना काम चला लेते हैं।’
मेरे नाना ठाकुर श्यामचरण सिंह जी कहा करते थे कि, ‘हिन्दी एक वैज्ञानिक भाषा है। इसे जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा भी जाता है। अंग्रेजी की तरह इसमें कोई अक्षर साइलेंट नहीं होता। हर अक्षर की अपनी अहमियत होती है।’
महात्मा गाँधी राष्ट्र के लिए राष्ट्रभाषा को नितांत आवश्यक मानते थे। उनका कहना था, “राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा है।” गाँधीजी हिंदी के प्रश्न को स्वराज का प्रश्न मानते थे— “हिंदी का प्रश्न स्वराज्य का प्रश्न है।” उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में सामने रखकर भाषा–समस्या पर गम्भीरता से विचार किया।
इसी तरह अनेक हिन्दी समर्थकों के सार्थक प्रयासों से 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा में हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया गया था। हिंदी के महत्व को बताने और इसके प्रचार प्रसार के लिए राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के अनुरोध पर 1953 से प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस के तौर पर मनाया जाता है। पं. गोविंदबल्लभ पंत का मानना था कि – ‘हिंदी ने राजभाषा के पद पर सिंहानसारूढ़ होने पर अपने ऊपर एक गौरवमय एवं गुरुतर उत्तरदायित्व लिया है।’
आज हिन्दी समर्थकों की चर्चा करते हुए मुझे याद आ रहा है कि विद्युत विभाग की अपनी नौकरी में लेखा प्रशिक्षण के दौरान जबलपुर स्थित ट्रेनिंग सेंटर के मुख्य कक्ष में लिखे सेठ गोविन्ददास के इस सूत्रवाक्य को मैं रोज़ पढ़ा करती थी कि – ‘देश को एक सूत्र में बाँधे रखने के लिए एक भाषा की आवश्यकता है, और वह भाषा हिन्दी के अलावा अन्य कोई और नहीं हो सकती।’ और इसे पढ़ कर हिन्दी के प्रति मेरा स्नेह द्विगुणित हो उठता। सन् 1896 में जबलपुर, म.प्र. में जन्में सेठ गोविन्ददास भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, सांसद तथा हिन्दी के साहित्यकार थे। उन्हें साहित्य एवं शिक्षा के क्षेत्र में सन 1961 में पद्म भूषण से सम्मानित किया गया था। भारत की राजभाषा के रूप में हिन्दी के वे प्रबल समर्थक थे। वे सन् 1947 से 1974 तक वे जबलपुर से सांसद रहे। हिंदी के अद्वितीय सेवक सेठ गोविंद दास जब तक जीवित रहे, हिंदी के उत्थान में लगे रहे। भारत में हिंदी के उत्थान के लिए जिन लोगों ने अपना पूरा जीवन लगा दिया, उनमें सेठ गोविंद दास का नाम अनन्य है। उन्होंने स्वतंत्रता के पहले और बाद में भी हिंदी के उत्थान के लिए काफी काम किया। अपने भाषणों में उन्होंने इस बात को पूरे दमखम के साथ रेखांकित किया कि हिंदी में नए शब्दों के निर्माण की स्वाभाविक क्षमता है।
हिन्दी भारत की पहचान है। किन्तु इस तथ्य पर भी गौर करना आवश्यक है कि भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची भारत की भाषाओं से संबंधित है। मूल संविधान में इस अनुसूची में चौदह भाषाएं दर्ज थीं। बाद में हुए संशोधनों के आधार पर अब इस अनुसूची में बाईस भाषाएं शामिल हैं और इन 22 भारतीय भाषाओं में हिन्दी भी एक है। हिन्दी को राजभाषा का दर्जा तो मिल गया है किन्तु देश की आज़ादी के बाद से 73 वर्ष की लम्बी यात्रा के बावजूद हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिल पाया है।
आइए हम दुआ करें कि हम सबकी लाड़ली इस हिन्दी भाषा को यदि राष्ट्रभाषा का भी स्थान मिले तो यह हम भारतवासियों के लिए गर्व की बात होगी। सचमुच हिन्दी अनेकता में एकता का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। इसने जिस ख़ूबसूरती से संस्कृत, उर्दू, फारसी, अंग्रेजी आदि के शब्दों को आत्मसात किया है, वह हमारे देश के मूलचरित्र को भलीभांति प्रतिबिम्बित करता है यानी अनेकता में एकता।

और अंत में प्रस्तुत हैं मेरी ये काव्य पंक्तियां –

मिलजुल कर रहने का हरदम,
पाठ पढ़ाती है हिन्दी।
कोई भी हो भाषा-भाषी,
सबको भाती है हिन्दी।
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सागर, मध्यप्रदेश

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