लघुकथा : चुल्लू भर पानी -चरनजीत सिंह कुकरेजा, भोपाल

25

चुल्लू भर पानी

देवेंद्र ने घर में प्रवेश करते ही जोरदार आवाज लगाई “कहाँ चले गए सब…घर में कोई है कि नही….।”
आवाज सुनते ही रानी पानी का गिलास लेकर बाहर आई।”लीजिये पापा आराम से बैठ कर पानी पीजिए और हाथ मुँह धोकर फ्रेश हो जाइए…मैं चाय बना कर लाती हूँ.. लाइए लेपटॉप मुझे दीजिये…”कहते-कहते रानी ने उनके हाथ से बैग और टिफिन ले लिया…।
जैसे ही वह मुड़ी देवेंद्र फिर खीजते हुए बोला “कहाँ है तुम्हारी महारानी…आराम फर्मा रही होंगी..हम दिन भर ऑफिस में खटते रहें..बॉस की जी हजूरी करें..और ये महारानी आराम से पलंग तोड़ती रहें…भेजो उसे बाहर..।”
रानी को अब तक एहसास हो चुका था कि,पापा आज दोस्तों के साथ फिर पैग लगा कर आये हैं…।आये दिन उनका रवैया ऐसा ही सख्त होता जा रहा था…।ऑफिस में यस सर..यस सर और घर में…एक हुक्मरान की तरह फरमान पर फरमान..।माँ को तो कुछ समझते ही नही…।वह ठहरी लड़की..समझ नही आता इस अत्याचार का विरोध कैसे करे..।
“पापा… माँ की तबियत ठीक नही है आज ..बहुत तेज बुखार है उन्हें…”
“अरे खूब जानता हूँ उसकी बहानेबाजी…मैं क्या जानता नही उसके मिजाज को…”और फिर भीतर की ओर रुख करते हुए लगभग चीखते हुए बोले “नन्दनी बाहर आओ जरा …तुम्हारा ताप उतारना है…।”
ताप उतारने के नाम पर रानी सहम गई..। पापा की गर्ममिजाजी का अंदाजा था उसे ,इसलिये उसने पापा के सामने से हटना ही उचित समझा..।वह भीतर जाने को ही थी कि,इंदर भी बाहर से आ गया..।आते ही वह भी पापा की शैली में रानी पर गुर्राया…
“रानी सुबह जीन्स धोने के लिए दी थी ….धो कर प्रेस कर दी है ना…” और फिर उसे जूते उतार कर देते हुए कहा “ये लो जूते वॉशरूम में ले जाकर अभी ही धो दो…मुझे कल कॉलेज की ट्रिप में जाना है दोस्तों के साथ….समझ गई ना.. ।”
इतने में ही मम्मी ड्राइंग रूम में आ गई “क्यों इतना शोर कर रहे हो दोनों..मेरा सर दर्द से फटा जा रहा है…।”
“तुमसे कितनी दफा कहा है …एक आवाज में आ जाया करो सामने…चलो भीतर तुम्हारी तबियत ठीक करता हूँ अच्छी तरह…”
“इसके सिवाय तुम्हे कुछ आता भी है क्या…रोज-रोज पी कर आ जाते हो …अरे बच्चों के सामने तो ठीक से पेश आया करो ….इंदर में भी अब तुम्हारे ही लक्षण दिखाई देने लगे हैं…।”
“मेरे से जुबान मत लड़ाया करो..मुझे अच्छी तरह जानती हो तुम..।ठहरो बच्चों के सामने ही ठीक करता हूँ तुम्हे..।”और इसी के साथ उसने बेवजह ही अपना रौब जताने के लिये नन्दिता पर हाथ उठा दिया..।हालाँकि उससे ठीक से खड़े रहते भी नही बन रहा था…लड़खड़ा कर गिरता इसके पहले ही रानी ने उसे संभाल लिया ।और बोली..”क्या पापा…आप तो कहते हो मेरी रानी बिटिया शहजादी है… राजकुमार ही होगा इसका दूल्हा…जहाँ जाएगी राज करेगी ….।ऊँचे-ऊँचे सपने दिखा कर बहलाते रहते हो।यदि वहाँ भी आप जैसा पति और इंदर जैसा देवर मिल गया, तो क्या खाक राज करूँगी में…।नशा उतर जाए तो सोचिएगा जरूर….।”
इसी के साथ उसने आधा बचा पानी का गिलास उसके सामने कर दिया।एक हाथ से गिलास पकड़ते हुए वह रानी के सर पर प्यार से दूसरा हाथ फेरते हुए बुदबुदाया “ये कमबख्त दारू छूटती ही नही…” फिर गिलास की और घूरते हुए बोला …” काश इस *चुल्लू भर पानी* में मैं डूब पाता…।और इसी के साथ वह धम्म से सोफे पर बैठ गया….।

चरनजीत सिंह कुकरेजा,
भोपाल

5 COMMENTS

  1. Har story aapki heart touching hoti hai ye samaj purush pradhanta samaj hai jo wife ko bilkul bhi respect dena nai janta man jo bhi kare jayaz hai woman apni baat bhi nai Rakh sakti Bahoot achhi trah se prastut kiya hai

  2. वाह,वाह,सोचने को मजबूर करती बहुत बढ़िया लघुकथा 👏👏👏👏👏👏👏👏👏

  3. नशीले पदार्थों का सेवन नैतिक मूल्यों के पतन का कारण बनता है , इस तथ्य को उजागर करती हुई बहुत ही सुन्दर संदेश देती एक बेहतरीन लघुकथा ।🤔🤔🤔

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here