काव्यभाषा : सरहदें -कनक हरलालका ,असम

94

Email

सरहदें

नहीं रोक सकतीं
हवाओं को ,
पानियों को ,
ध्वनियों को ,
मत भूलो कि
गटर से उठती
दुर्गन्ध ,
तुम्हारी हवाओं में भी
घुलती हैं ।
मत भूलो कि
पानी में बहती
लहू की धार
तुम्हारी नदी में भी
मिलती हैं ।
मत भूलो कि
उनकी चीखें
तुम्हारे पहाड़ों में भी
सुनती हैं ।
कैसे कह सकते हो
जहन्नुम पड़ोस में
और
घर तुम्हारा जन्नत है ।
जहन्नुम से उठता
हर विषैला धुंआं
जन्नत के वहम को
खाकसार करता है ।
बन्द करो गटर को
या वहाँ
ताजी हवाएं भेजो ।
बसना पड़ोस में
जहन्नुम के ,
जन्नत को शर्मसार
करता है ।।।

– कनक हरलालका
असम

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here