लघुकथा : सर्वाधिकार – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

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सर्वाधिकार

प्रभात के चार मंजिला नए घर का इंटीरियर पूरा हो चुका था।आज उसका बरसों से देखा सपना पूरा हो गया था।एक ही छत के नीचे इंटरटेनमेंट हॉल, थियेटर रूम, स्पा, जिम,आधुनिकता से परिपूर्ण किचन,ड्राइंग रूम,आँगन में वॉटर बॉडी के साथ छोटा लेकिन खूबसूरत पार्क ,घर के भीतर लिफ्ट ,छत पर आरामदेह झूला वगैहरा सब कुछ सपनों के मुताबिक….।उसके चेहरे खुशी देखते ही बनती थी।
अगले हफ्ते शिफ्टिंग का प्लान था।उसीकी तैयारियाँ पूरे उत्साह से चल रही थी।प्रभात के पसंदीदा आर्टीकेट के निर्देशन में ही घर की साज-सज्ज़ा हुई थी।दीवारों के रँग रोगन,लाइटिंग,फर्नीचर ,बरामदे में गमलों के रख रखाव से लेकर दीवारों पर लगने वाली पेंटिंग और पारिवारिक तस्वीरों के चयन में आर्टीकेट महोदय का बराबर दखल था।प्रभात चूंकि उनके साथ कई प्रोजेक्ट कर चुका था, इसलिए उस पर उनका अच्छा खासा प्रभाव था।तभी तो वह अपनी ख्वाहिशों को किनारे करते हुए उनके हर मशवरे पर अपनी स्वीकृति की मोहर लगा रहा था।सारा सेटअप जम चुका था।आज पुराने घर से लाई गई तस्वीरों का नए घर की एक दीवार पर कोलाज़ बनाने के लिए चयन हो रहा था।उन्होंने
कुछ तस्वीरों को फर्श पर जमाते हुए कारपेंटर को उसी प्रारूप में दीवार पर लगाने के लिए निर्देशित किया। दो बड़ी गोल्डन फ्रेम में जड़ी तस्वीरों को अलग-थलग उपेक्षित पड़ा देख प्रभात ने हिम्मत जुटा कर कहा “सर ये गोल्डन फ्रेम वाली दादा-दादी और मम्मी-पापा की तस्वीर कहाँ लगाना है…”
उसकी ओर बड़े गौर से देखते हुए वह बोले..”प्रभात जी अब इन्हें अलमारी में रख दीजिये ।अब यहाँ इतनी ही तस्वीरें काफी हैं।इन्हें साथ लगाने से दीवारें भरी-भरी लगेंगी….और फिर अब ब्लैक एंड व्हाइट का जमाना भी तो नही रहा न…।पुरानी जीवन शैली बदलिए प्रभात जी…आपका स्तर अब ऊँचा हो गया है।”
“और सर…ये पेंटिंग मेरे बहुत करीबी दोस्त ने उपहार स्वरूप दी है।ये तो सेट हो जाएगी न….इसे तो सेट करना ही है…बड़ी आत्मीयता से भेंट दी है उसने…।”महोदय ने उस बड़ी सी पेंटिंग पर गौर किया …आकर्षक फ्रेम में जड़ी आराध्यदेव की मनभावन पेंटिंग को नमन करते हुए बोले “प्रभात जी मंदिर का सेटअप तो पूरा हो चुका है।ऊपर से नीचे तक मेरी नजर अब ऐसी कोई जगह बची नही है…जहाँ इस पेंटिंग को स्टॉल किया जा सके…अभी तो इसे पैक कर के कहीं रखवा दीजिये….। कल फोटो शूट है…सोचते हैं बाद में कुछ इसके बारे में भी…।”
इतनी देर से चुप्पी धारण किया हुआ हिलौरे मार रहा मेरा मन अब मौन तोड़ने पर विवश हो गया “सर…”अपने बेटे की उम्र के आर्टीकेट को सर कहना शायद वक्त का तकाजा था…।”सर…जिनके आशीर्वाद से आज प्रभात को यह *शुभप्रभात* नसीब हुई ,…वह सीढ़ियाँ चढ़ते हुए यहां तक पहुँचा है…यदि इस घर में उनकी जगह नही बन पा रही है…तो उस परवरदिगार के दरबार में हमें उचित स्थान मिलना भी मुश्किल हो जाएगा….।”
“हमारी और हमारे पूर्वजों की तस्वीरे तो हम अलमारियों में बंद कर देंगे पर हर पल जिनकी स्तुति करते हम नही थकते…,उन्हें तो सम्मान सहित उचित स्थान पर स्थापित किया ही जाना चाहिए….।” मेरा लहजा थोड़ा तल्ख तो था…पर मन की पीड़ा उगल कर खुद को हल्का करने के लिए यह जरूरी भी था…।
अपनी बात रखते हुए… (जिसे पत्नी का भी समर्थन प्राप्त था….)मैंने प्रभात की और देखा…वह मेरे तर्क का अनुमोदन करने की बजाय हम दोनों को घूरे जा रहा था…उसकी एकटक मूक दृष्टि से स्पष्ट समझ आ रहा था …ऐसा लगा जैसे वह अपरोक्ष रूप से हमें कहना चाह रहा है…”माँ-पापा ….आपका नए घर में स्वागत है…।आइए पधारिये…रहिए..इंज्वाय कीजिये…पर ध्यान रखिये…इस घर के *सर्वाधिकार* मेरे पास सुरक्षित हैं….।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

  1. Har bar ki trah heart touching story hai story kya ha har ghat ke bujurgo ki Aap beeti hi hoti hai kahi na kahi bachhe hi ho jate hai so apni dharohar khud sambhal kar rakhni chahiye new generation se koi bhi argument nai Karna chahiye

  2. पारिवारिक जीवन में नई पीढ़ी के मानसिक बदलाव को अभिव्यक्त करती हुई बहुत ही सुन्दर रचना।
    प्रारंभ से अंत तक उत्सुकता को बनाये रखने में कामयाब।
    पढ़ते हुए ये महसूस होता है कि इसी तरह के परिवेश से हमारा रोज़ सामना हो रहा है।
    रचनाकार एक पीढ़ी के दर्द को महसूस कराने में पूरी तरह से सफल हुए हैं ।🌷🌷🌷

  3. I do agree with all of the ideas you’ve offered to your post. They’re very convincing and can definitely work. Still, the posts are too brief for starters. May just you please prolong them a bit from subsequent time? Thanks for the post.

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