काव्यभाषा : वीर पवन -चन्द्रकान्त खुंटे लोहर्सी,जांजगीर चाम्पा

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वीर पवन

ऐ वीर! हवा
सुरभित-सुगंधित बहा
मन्द-मन्द बहकर
घर-घर आनन्द पहुँचा।

ऐ वीर! हवा
निडरता निज दिखा
सौरभ सी केसर बहाकर
धरा के ओना-कोना पहुँचा।

ऐ वीर! हवा
मन भर वर्षा में नहा
कर अम्बु को ग्रहण
जनों के शोक-संताप मिटा।

ऐ वीर! हवा
ठंड में न जड़ा
शीतल का हस्त थामकर
हृदय को हर ले जा।

ऐ वीर! हवा
ग्रीष्म से न डरा
उमस को शिकस्त देकर
विश्व-जहां में शांति पहुँचा।

ऐ वीर! हवा
बिकराल रूप न दिखा
तुम्हारा कर्म जीवन देना
प्राण हर कर न ले जा।

ऐ वीर! हवा
घनघोर-घटा ले के आ
कृषकों पर कर रहम
निर्बलों को खुशियां पहुँचा।

ऐ वीर! हवा
थोड़ा साहस करके दिखा
दुष्टों का कर संहार
भूमि को पावन बना।

ऐ वीर! हवा
मुखड़ा निज दिखा
हो जाऊं तुझ पर कुर्बान
मुझको ऐसा राह बता।

ऐ वीर! हवा
निज भुवन का दे पता
जाऊं तेरे द्वार
उपकार के बदले करुं सेवा।

✍🏻✍🏻चन्द्रकान्त खुंटे
लोहर्सी,जांजगीर चाम्पा(छग)

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