काव्य भाषा : मैं-मैं, तू-तू -श्रीराम निवारिया,इटारसी

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कविता
मैं-मैं, तू-तू
श्रीराम निवारिया

गर्भ में पड़ा हुआ
भ्रूण है ‘मैं’
जो अँधेरे से घिरी दीवारों में कैद
अविकसित, अनंत संभावनाओं का पुंज
और अविकसित गर्भ के अँधेरे से भी
बड़े अँधेरे में बदल सकता है

इसमें जब तक
‘तू’ की खिड़की नहीं खुलती
तब तक सिर और आँख विहीन
उधार की धड़कन भर है

हालाँकि पुस्तक तो मैं-मैं की ही लिखते हैं सब
लेकिन ‘तू’ के प्रकाश पड़े बिना
किसी के क्या काम की
जिल्दबंद
वह विश्वकोश ही क्यों न हो

मैं मिट्टी तो जरूर हो सकता है
पर
जो फूल खिलते हैं
जो सुगंध आती है
जो पुरवाई के साथ
दिक्-दिगंत तक बह जाती है

जो सूरज और हवा के बिना
कैसे हो सकती है संभव
और यह सूरज और हवा
‘तू-तू’ ही है

मैं के अंधकारमय भ्रूण को
तू के आलोक से
स्नान करने दें
नहीं तो मैं-मैं का अँधेरा
मार लेगा कुल्हाड़ी
अपने पैर मैं पर
हाथों से खुद अपने ही।