काव्यभाषा : पैनल परिचर्चा -राजीव रंजन शुक्ल पटना

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पैनल परिचर्चा

चैनल का पैनल परिचर्चा
बहुमूल्य समय का बेमतलब खर्चा
नहीं निकलता कोई निष्कर्ष
लगता जैसे कोई कार्यक्रम है विनोद और हर्ष
जैसे ही कोई विशेषज्ञ अपना विचार रखते
लेते है ब्रेक की उद्घोषणा का आवाज गूँजते
एक ब्रेक के बाद है आते
बड़ी खबर को फिर से रबड़ बनाते
शालीनता की दिवारे ढहती
अमर्यादित शब्दों की नदियाँ बहती
टूटती है सारी मर्यादा
बेचारे विशेषज्ञ अपने विचार रख पाते आधा
सुनते है कम सुनाते ज्यादे
तेज आवाज मे बोलकर विशेषज्ञ बन जाते
सभी ही के पास होती है
अपनी बड़ी खबर
कुछ दिनों तक मचा हलचल
सभी से हो जाती है
यह बेखबर
चैनल का पैनल परिचर्चा
बहुमूल्य समय का बेमतलब खर्चा।

राजीव रंजन शुक्ल
पटना

6 COMMENTS

  1. सच्ची बात। यही होता है खबरिया चैनलों पर टीआरपी की होड़ में।बहुत अच्छा व्यंग।

  2. चैनल वालों तक बस ये कविता पहुंचा दीजिए सिर…pl…

  3. डिबेट में आने वाले महानुभाव ( विशेषज्ञों ) पर अच्छा व्यंग है ।।।

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