काव्यभाषा : वादियों का विस्मय -चन्द्रकान्त खुंटे लोहर्सी,जांजगीर-चाम्पा(छग)

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वादियों का विस्मय

चक्षु उठायें
निरखता क्षितिज पार
जहाँ मिलते भूमि-अम्बार
कभी देखता विद्रुम-झाड़
नजर दौड़ाते पर्वत-पार
ऊँचे टीले,गहरे नीले
दूर आसमां को देखते
तरु डाली,पड़ती छाई
मन्द पवन मुस्काते चलते
ठंडी हवा फुलझड़ियां बहते
कुछ सोंचते,कुछ विचारते
प्रकृति में खोया है कोई?
दूर वादियों में बैठा है कोई?

धूल-धुओं से नहला
नजर आता गहरा नीला।
काले-काले श्वेत बादल
बिजली चमकती हर-पल।
सुनकर दिल जाते दहल
किसने बनाई यह अंबर?
कैसे लटका अधर-पर?
गगन से था प्रेम -अमर
नीरद को हुई बिछड़न का डर।
नैन में आंसू लाकर रोई
तभी सर्वत्र बरसात होई।
यह सोंचता दूर वादियों में बैठा है कोई ?

करते रवि नमस्कार
निकला दूर रत्नाकर पार
क्यो पड़े वह बीमार?
ज्यो रहता सदैव बुखार
मन संकुचित लगता भार
गुमराह सा बैठ करता विचार
कैसे निकालते अंगारे भरमार?
क्यो दिखते दिनकर लाल?
कहां सोते और निकलते?
जैसे आदेश पाता हो कोई?
यह सोंचता दूर वादियों में बैठा है कोई ?

वह देखता प्रकृति रंजन
ज्यो लगते नयन-खंजन।
दूर विटप का भाल
अपलक देखते पहार।
किसने बनाई यह दीवार?
जो थामते बिजली का भार।
सहते सब निष्ठुर आघात
मेघ के लिये बन आफत
रहते अडिग यथावत।
मानो वह गहरी निद्रा में खोई
यह सोंचता दूर वादियों में बैठा है कोई ?

विद्रुमो की लगी कतार
कही ऊंचे लगते पार?
कही क्षुद्रो की भरमार?
जंगल फैली अपरम्पार
मन मे आते अनेक विचार
किसने लगाई ऊँची झाड़?
या निकला हो भूमि फाड़
नही तो किसने है बोई ?
यह सोंचता दूर वादियों में बैठा है कोई ?

देखा नजर दौड़ाकर,
फैले विशाल रत्नाकर।
श्रेष्ठ-लघु रहते जलचर,
इतने प्यास किसको लगती?
कैसे बनी होगी ये जलघर?
अथाह गहराईयों से भरा,
लहरे उठती गगन भर।
विशाल सलिलो का मेला
तटिनी का है घर-फैला
उसे देख अन्यन्त आनन्द होई
यह सोंचता दूर वादियों में बैठा है कोई ?

✍🏻✍🏻चन्द्रकान्त खुंटे
लोहर्सी,जांजगीर-चाम्पा(छग)

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