काव्यभाषा : नारी अनेक रूप अवतार -सुखविंद्र सिंह मनसीरत खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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नारी अनेक रूप अवतार

नारी तेरे अनेक रूप अवतार
हर रूप में महिमा है अपरम्पार

प्रत्येक रूप तेरा बड़ा महान है
नारी गुणों की अदभुत खान है
सदभाव सद्गुण विराजमान हैं
सहज,सरस,सरल और सत्कार

मृदुभाषी और वाणी में मिठास
किसी प्रति न कड़वाहट खटास
कुटुंब में फैलाए मधुरिम मिठास
सादर मनभावन रसिक व्यवहार

नारी दुर्गा ,नारी लक्ष्मी,सरस्वती
हर माता रूप मे है रहती बसती
लक्ष्मीबाई, तारा,सुचेता,सहगल
स्वतंत्रता सैनानी हो महान नार

देवकी माता या हो यशोदा मैया
मां के रूप में दुख हरती है मैया
होलिका दहन में थी देह त्यागी
निज पर न कभी किया विचार

माँ,बेटी,बहन,पत्नी,सखा,सहेली
सास,बहू,,ननद,जेठानी ,देवरानी
चाची,ताई ,मौसी .भाभी भरजाई
रिश्तों में जिम्मेदारी निभाई अपार

त्याग, बलिदान की प्रतीक नारी
सहन करती दिखाए न लाचारी
मनसीरत घुट घुट के रहती मरती
निज स्वप्न तज बनती सदाबहार

सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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