लघुकथा : निस्वार्थ सेवाभाव – नीलम द्विवेदी,रायपुर

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निस्वार्थ सेवाभाव

आज से आठ साल पहले की बात है। हम लोग साईं बाबा के दर्शन के लिए शिर्डी जा रहे थे। रायपुर स्टेशन से ट्रेन में बैठे थे। कुछ देर बार रात का खाना खा कर सोने की तैयारी ही कर रहे थे कि देखा एक आदमी जो भले घर का दिख रहा था, जिसके साथ एक पांच छह साल की एक बच्ची भी थी,कुछ लोगों से मदद मांग रहा था। कह रहा था कि उसका सारा पैसा और सामान चोरी हो गया था और उसके पास बच्ची को खिलाने और घर तक पहुंचने के भी पैसे नहीं है। उसका सफर लंबा था। कोई भी उसकी बात पे यकीन नहीं कर रहा था क्योंकि आजकल इसी तरह लोगों को बेवकूफ़ बनाया जाता है। मेरे पतिदेव जिनको बेटियों से बहुत ही ज्यादा लगाव था, उन्होंने उसकी बेटी की तरफ देखा। बैग से कुछ बिस्किट और चिप्स के पैकट निकाल के बच्ची को दिया। यहां तक तो मुझे भी ठीक लगा। बच्ची सच में भूँखी थी, उसने तुरंत ही खाना शुरू कर दिया। फिर मेरे पतिदेव ने उसके पिता को बुलाया और पूछा कि कितने पैसे में तुम्हारा काम चल जाएगा उसने कहा पांच सौ में हो जाएगा साहब। मेरे पति ने उसे पैसे दे दिए।उस आदमी ने इनका मोबाइल नंबर ले लिया और कहा कि पहुंचते ही आपका पैसा लौटा देगा। मैं ये सब देख रही थी।उस आदमी के दूर जाते ही मै इन पर बरस पड़ी कि आपको बेवकूफ़ बना के चला गया,कभी नहीं लौटाएगा,ये सब एक धंधा है लोगों को भावनात्मक रूप से कमज़ोर करके लूटने का।सारे लोग समझदार थे जो उसकी बातों में नहीं आए।आप को तो कोई भी लूट के चले जाए। मैं थोड़ा नाराज़ सी हो गई। मेरे पति बोले,तुम एक बार होटल में खाना खाती हो तो इससे ज्यादा का ही बिल बनता है। समझ लेना आज होटल में खाना खा ली। मैंने कहा बात पैसे की नहीं है आपको उस आदमी द्वारा मूर्ख बनाने कि है। वे बोले कि समझ लो उस बच्ची के लिए दान कर दिए। सुबह हम लोग शिर्डी पहुंच गए। दो दिन दर्शन आदि किए, घूमे फिरे। हम वापस रायपुर आ गए। अगले दिन मैं सुबह सुबह चाय बना रही थी कि मेरे पतिदेव का मोबाइल बजा। उसी आदमी का फोन था,पैसे कैसे ,किस खाते में भेजना है पूछ रहा था। मेरे पतिदेव ने उसको पैसे भेजने से मना करते हुए कहा कि आप भी कभी किसी जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता कर देना। फिर वो मेरी तरफ देखे और बोले देखा नीलू हर इंसान धोखेबाज नहीं होता, कुछ ग़लत लोगों के डर से हम कभी कभी सही लोगों की भी मदद नहीं कर पाते। अगर हमारे पास इतना है कि हम दूसरों की मदद कर सकें तो जरूर करना चाहिए। भगवान का शुक्र मानना चाहिए कि हम इस लायक तो हैं कि किसी के काम आ सकें। हो सकता है कभी कभी मूर्ख भी बन जाएं पर दिल में कभी कोई पश्चाताप तो नहीं रहेगा। मेरे पति की ये बात मुझे हमेशा याद रहती है। मै अब दरवाजे पे मदद मांगने आए व्यक्ति को कभी मना नहीं करती। अब तो ऐसा हो गया है कि जब कहीं कोई मदद नहीं मिलती तो लोग मेरे पास ही आते हैं आखिरी उम्मीद लेकर। मेरी ईश्वर से यहीं प्रार्थना है कि हमेशा इस काबिल बना के रखे कि दूसरों की मदद करती रहूं। कभी ऐसा धोखा नहीं मिले जिससे मेरे विश्वास इंसानियत पर से डगमगाए।अगर कभी धोखा मिले, तो भी मेरा निस्वार्थ सेवा भाव उससे प्रबल निकले।

नीलम द्विवेदी
रायपुर छ्तीसगढ़

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