काव्यभाषा : मैं फिर लिखूंगा – सुनील मिश्रा,मेरठ

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“मैं फिर लिखूंगा”

प्रिय…
मैं फिर लिखूंगा
अबकी बार सबके लिए नहीं…
सिर्फ तुम्हारे लिए
सच में
हंसने के लिए ना…
सिर्फ-और-सिर्फ
तुम्हारे संघर्ष की राहों पे…
राजनीति साजिशों में
प्रतिपल कांपता हुआ
समय के करवटों के चक्र
एक बार फिर सपनों को गूथनें के लिए…
प्रतीक्षारत जिंदगी
गहरी बेचैनी के साथ
सत्ताधीसों के षड्यंत्रों से
चुनाव के मेघ आतें ही
नये -नये विज्ञापन बरसने लगते है….।
और बेरोजगारी मुक्ती , शिक्षा,स्वास्थ्य,आदि के टर्र-टर्र भिनभिनाहट भरी आवाजें …
सास्वर की अनुगूंजे खूब मरी हुई मछलियों की तरह वातावरण में फैली पड़ी है…।
चुनाव होते ही
एकाएक भयंकर
दमन-चक्र का …
विस्फोट होता है..।
विज्ञापनों की अर्थी
हू-ब-हू कबीर की अर्थी की तरह
हिंदू, मुस्लिम, करते रहते …।
यहां पर उच्च न्यायालय व सुप्रीम- कोर्ट के आदेश में…
‘ यीशु’ की मूर्ति तरह लटकी है…।
इन्हीं जहरीली हवाओं की लपटों में…
तारीख़-पर-तारीख़
न्याय की गोद में
सत्य तिल-तिल कर मरता हुआ…।
साहे-वक्त-के निज़ाम
जमाने से दो -दो हाथ अजामाने में लगे… ।
हिंदुस्तान का रुख बदलने के लिए
जनता को साम्प्रदायिक
लोरिया सुना-सुनाकर…
ऐड़ा-बेड़ा खड़ा कर दिया…।
मुस्कुराता हुआ
झांकता हुआ
देखता है….।
मृत्यु की त्रासदी में
डूबता हुआ…
आत्मा का चांद..।
पांच में दो बार आते है
विचार में ख्याल…
विश्व की प्रसिद्ध क्रांति के…
उदघोष व्यंग्य भरे शब्दों में कहते है…।
अबकी बार रोटी नहीं ब्रेड़ देगें…।
शोषण के लिए सरकारें खड़ी है।
जनता पे कुर्बान
प्रिय अकेले तुम अड़ी हो…
मुझे तुम्हारी बेचैनी महसूस करने को
मिलता है…
प्रिय…।

सुनील कुमार मिश्रा
शोधार्थी, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय मेरठ

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