काव्यभाषा : वो लम्हें जो तेरे संग -नीलम द्विवेदी रायपुर छत्तीसगढ़

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वो लम्हें जो तेरे संग…

वो लम्हें जो तेरे संग कभी गुजर जाते थे ,
वो वक़्त जो तेरे इंतज़ार में कट जाते थे,
आज वो वक़्त भारी सा लगा करता है,
हर दिन अब उधारी सा लगा करता है,
जाने किसको तलाशता है दिल अकेले में,
तेरी यादें टटोलता है दिल अकेले में,
बात करती हूँ हर किसी से फिर भी,
एक सन्नाटा पसरता है मन के कोने में,
भीड़ में भी नहीँ छिपता है अब मेरा चेहरा,
साथ है दुनिया मगर फिर भी हम अकेले हैं,
भीड़ में वो बात नहीं, जो थी तुझ अकेले में,
नहीं भूलेंगें वो लम्हें जिसमें शामिल तेरी बात है,
वक़्त अब रेत सा फिसलता है मेरे हाथों से,
हाथ ने मगर कुछ तेरे निशान सा रह जाता है,
वो लम्हें जो तेरे संग कभी गुजर जाते थे,
याद बन कर मेरे जीवन में बिखर जाते हैं।

नीलम द्विवेदी
रायपुर छत्तीसगढ़

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