नैन नचाय कह्यो मुस्काय,लला फिर आइयो खेलन होरी”

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पद्माकर : फलक विस्तार –राष्ट्रीय वेबिनार सम्पन्न
“नैन नचाय कह्यो मुस्काय,लला फिर आइयो खेलन होरी”

पंडित दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर के हिन्दी विभाग में आयोजित राष्ट्रीय वेबिनार की अध्यक्षता प्राचार्य डॉ जी एस रोहित ने की तथा पद्माकर के जीवन के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला। महाकवि पद्माकर :शब्द, समय और समाज” पर केन्द्रित राष्ट्रीय वेबिनार के मुख्य अतिथि माननीय सांसद श्री राज बहादुर सिंह ने कवि पद्माकर को सागर का गौरव बताते हुए उनके जीवन दर्शन,प्रकृति प्रेम मानव जीवन के विकास के मार्मिक प्रसंगों पर विस्तार से प्रकाश डाला। विशिष्ट अतिथि माननीय विधायक श्री शैलेन्द्र कुमार जैन जी ने कहा कि पद्माकर जी ने सागर और बुंदेलखंड को पूरी दुनिया में बिखेरने का काम किया। राजसी वैभव के साथ रहने वाले पद्माकर को व्यापक राजसी सम्मान मिला।
विषय प्रवर्तन करते हुए डा श्याम सुन्दर दुबे जी ने पद्माकर के बहुआयामी साहित्य सृजन की चर्चा करते हुए उनकी सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय चिंता के साथ भावमयी अनुभूतियों से परिचित कराया।नायक नायिकाओं के आनन्द उल्लास के सहज चित्र,फाग की मस्ती, बासन्ती अल्हढता , सौन्दर्यपरक हाव-भाव चेष्टाओं के साथ अनुप्रास अलंकारिक वैशिष्ट्य का दिग्दर्शन कराया। उद्घाटन सत्र का संचालन हिन्दी विभागाध्यक्ष व कार्यक्रम की समन्यवक डॉ सरोज गुप्ता ने किया।
” पद्माकर के काव्य में परिवेश एवं समय ” प्रथम सत्र के मुख्य बक्ता डा कांति कुमार जैन सागर ने बुंदेलखंड के फागोत्सव का सचित्र वर्णन किया –“फाग की भीर अभीरन” द्वारा लोकभाषा के सहज सरल शब्दों की अद्भुत व्याख्या की। पद्माकर पर शोधकार्य व उनके साहित्य का सम्यक मूल्यांकन अपेक्षित है। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डा श्याम सिंह शशि जी ने कहा कि पद्माकर जी ने सांस्कृतिक मूल्यों को जनजीवन में आदर्श रुप में प्रतिष्ठित किया।ऐसी शब्द नियोजना और जीवन की ऐसी अद्भुत व्याख्या पद्माकर के काव्य में मिलती है कि पूरा चित्र आंखों के समक्ष अंकित हो जाता है। डॉ संध्या टिकेकर ने कहा कि आमोद प्रमोद प्रधान रीति युग में पद्माकर ने स्वस्थ नारी प्रेम, नायिका सौन्दर्य, वीरतापरक चित्रण ,तत्कालीन समाज के रीति-रिवाजों का चित्रण कर नितांत मौलिक काव्य सृजित किया।श्री संजय पाठक ने मधुर आवाज में पद्माकर के भक्ति काव्य-“जमपुर द्वारे लगे न तिनमें,किनारे कोऊ। हैं न रखवारे ऐसे बनिके उजाले हैं।”का सस्वर गायन करते हुए उनके काव्य में जीवन मूल्यों के उत्कर्ष और आम जन के सुख-दुख के चित्रण की बात कही।प्रथम सत्र का संचालन आयोजन सचिव वरिष्ठ प्राध्यापक डॉ रंजना मिश्रा ने किया।
द्वितीय सत्र – “पद्माकर के काव्य में शब्द व लय का सौन्दर्य”पर केन्द्रित रहा।सारस्वत वक्ता वरिष्ठ साहित्यकार श्री निर्मलचंद निर्मल ने कविता के माध्यम से कहा – “पद्माकर कमल खिला था,तालाब के किनारे” भावपूर्ण कविता सुनाकर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया तथा पद्माकर की रचनाधर्मिता, व्यक्तित्व व कृतित्व पर उत्कृष्ट विचार सांझा किए। पूर्व प्राचार्य डा अहिल्या मिश्रा, हैदराबाद ने पद्माकर साहित्य में वर्णित चित्रात्मक काव्यभाषा की सामाजिक संरचना,ध्वन्यात्मकता,वीरोचित अर्थभावना, नारीशक्ति के विभिन्न आयामों का दिग्दर्शन किया। पद्माकर की वंशज श्रीमती सुषमा जगदीश शर्मा ने जयपुर से पद्माकर के जीवन और वर्तमान में उपलब्ध उनकी स्मृतियों का विवेचन किया। डा सच्चिदानंद देव पाण्डेय ने झारखण्ड से कविता और साहित्य के सुंदर समन्वय का पद्माकर के काव्य में गंगा के रुपक को बिंब विधान द्वारा प्रस्तुत किया। डा श्रीराम परिहार खण्डवा, ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि रीतिकाल का वास्तविक मूल्यांकन नहीं हुआ।नये सिरे से शोधार्थियों को पद्माकर जैसे कवियों पर शोधकार्य करना चाहिए। पद्माकर ने अपनी रचनाओं में जीवन के विविध पहलुओं को लयबद्ध कर भावयत्री और कारयत्री प्रतिभा का निदर्शन किया। द्वितीय सत्र का संचालन कार्यक्रम सहसचिव डॉ प्रीति यादव ने किया। कार्यक्रम में सह समन्वयक डॉ मधु स्थापक, तकनीकी समन्वयक डॉ इमराना सिद्दीकी , डॉ अमर कुमार जैन जी उपस्थित रहे।
आभार – आयोजन सचिव डा रंजना मिश्रा द्वारा व्यक्त किया गया। इस महती आयोजन में सागर के साहित्यकारों, विद्वानों के अतिरिक्त जूम के माध्यम से 100 प्रतिभागी तथा फेसबुक के माध्यम से लगभग 300प्रतिभागियों ने सहभागिता की तथा फेसबुक पर कार्यक्रम प्रतिक्रियायें प्रतिभागियों ने व्यक्त की हैं। महाकवि पद्माकर सागर शहर में अवश्य जन्मे, परन्तु एक सार्थक रचनाकार अपने जन्म स्थान और प्रदेश की चौहद्दी तक सीमित नहीं होता इसलिए महाकवि पद्माकर सागर के होते हुए भी सार्वदेशिक हैं क्योंकि भावव्यंजना , संवेदना संपृक्ति और कथ्यशिल्प की बारीकियां उन्हें उत्कर्ष का शिखर प्रदान करती हैं।
पद्माकर के जीवन के कई वर्ष सागर में व्यतीत हुए यायावरी जीवन जीते हुए जयपुर, पन्ना , दतिया , ग्वालियर , बांदा आदि स्थानों पर राजदरबारी कवि के रूप में प्रतिष्ठित रहे हैं परन्तु सागर से महाकवि पद्माकर का विशेष लगाव रहा है। रीतिकालीन कवियों में अग्रगण्य पद्माकर जी का साहित्यिक क्षेत्र में अभूतपूर्व योगदान है।उनका काव्य सांस्कृतिक पृष्ठभूमि और पुनर्जागरण की शाश्वत चेतना से सम्बद्ध है। सौन्दर्य चेतना के साथ अध्यात्म और भक्ति पर नवीन स्वर प्रदान करता है। इसलिए आज भी महाकवि पद्माकर जी प्रासंगिक हैं।

डॉ सरोज गुप्ता
प्राध्यापक हिन्दी विभाग,
पं दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय सागर (म प्र)

द्वारा_डॉ चंचला दवे, सागर,म प्र

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