काव्यभाषा : दोस्त खुद से मोहब्बत किया कीजिये -सुषमा दीक्षित शुक्ला लखनऊ

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दोस्त खुद से मोहब्बत किया कीजिये ।
जिंदगी को न यूँ ,बददुआ, कीजिये ।

बेख़ुदी में क़दम डगमगा गर गये।
फिर से उठके सम्भलकर चला कीजिये ।

जिंदगी खौफ़ में ना गुज़र जाये यूँ ।
हक़ की ख़ातिर ख़ुदी से लड़ा कीजिये ।

खुद से रूठो नही ख़ुद को कोसों नही ।
खुद से नफ़रत कभी ना किया कीजिये ।

जिंदगी है हंसीं है ये दुनिया हंसीं ।
इसको जन्नत के माफ़िक जिया कीजिये ।

हर किसी के जनम में है मक़सद छुपा ।
फ़र्ज पूरे सनम बावफ़ा कीजिये ।

नाम रोशन रहे जिससे माँ बाप का।
काम ऐसे हमेशा किया कीजिये ।

ज़िन्दगी इक डगर है गुलों खार की ।
,सुष ,मगर इसको जी भर जिया कीजिये ।

© सुषमा दीक्षित शुक्ला
लखनऊ

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