काव्यभाषा : जन जन के राम -अविनाश तिवारी अमोरा

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जन जन के राम

राम आदर्श जीवन का
भाव मय विश्वाश हैं
राम पुनीत पावन नाम
जग के प्राण आधार हैं

राम हैं विरक्त मोह से
प्रेम की भाषा राम हैं
भरत के अश्रु दल का
नेह बन्धन राम हैं

पुत्र हो तो राम सा
पितृ आदेश का मोल है
चुन लिए कंटक स्वयं ही
राज का न मोह है

राम सा भातृ नहीं
लखन भक्ति का मूल है
तपोवन में तपे सौमित्र
नयन राम में लीन है

अग्नि परीक्षा सिय की
राम स्वयं ने ही दिया
सीता निरखि अग्नि से
अनल राम ने पिया

राम ही कला स्वम्भू
राम जीवन मार्ग हैं
राम सांसो में बसे
राम ही परम धाम हैं।

@अवि
अविनाश तिवारी
अमोरा
जांजगीर

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