काव्य भाषा : कुण्डलीया छंद -सुनीता द्विवेदी कानपुर उत्तरप्रदेश

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कुण्डलीया छंद


सुन्दर ऐसा चाहिए ;जो मन मंजुल होय
सुंदर सदैव, मन भला ;तन छवि देता खोय
तन छवि देता खोय; बूढ़ा तब तन ना भावै
फीकी आंखें होय; गात श्वेत ना लुभावै
अरूणिम अधर खोय :जर्जर हो काया मंदर
कह सुनी बना रहे; सु मन सदा ही सुंदर

संतोष  उर धरे सदा:लोभ कभी ना आय
सुखी रहें जीवन सदा :चैन कभी  ना जाय
चैन कभी  ना जाय : आनन्द सदा मनावै
खुशी पाय हर हाल: नित नए मोद मनावै
सुख भले वो पाय :चाहे आवै दुख दोष
सुनी सभी सुख आय: जब आ जावै संतोष

सुनीता द्विवेदी
कानपुर उत्तरप्रदेश

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