काव्यभाषा : ज़िन्दगी – कुन्ना चौधरी,जयपुर

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ज़िन्दगी

भेड़ बकरी तो नहीं फिर भी मुझे हाँकती रही ज़िन्दगी,
झाड़ दरख़्त भी नहीं फिर भी छाँटती रही ज़िन्दगी..!

अपनी मंज़िल तय करने का हक़ तो न मिला कभी ,
ग़ुलामों की तरह ग़ैरों का हुक्म बजाती रही ज़िन्दगी…!

सदियों से चलती रिवायतों की कैसे करती अवहेलना,
मन मयूर को ज़ंजीरों में हमेशा बांधती रही ज़िन्दगी ..!

समय की ताक़त से अनजान तो नहीं थे हम कभी ,
फिर भी घड़ी की टिक टिक पर नाचती रही ज़िन्दगी.!

द्रवित आकांक्षाओं को न मिले किनारे कभी ,
फिर भी उमंगों के प्रवाह में बहती रही ज़िन्दगी…!

थक के रुकने का विकल्प तो न था कोई ,
ग़म की आँधियों में चिराग़ जलाती रही ज़िन्दगी..!

अब और कितने इम्तिहान है बाक़ी बता दे या रब ,
सुकून की चाह में पल पल डगमगाती रही ज़िन्दगी …।

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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