काव्यभाषा : एक हकीकत यह भी…! – रवि प्रभात श्रीवास्तव “मनीष” ,हाजीपुर

Email

एक हकीक़त कहूं…

बस यही कि अब हक़ीक़त कहना हम भूल गए,
रक्तचाप को चाप के रखे जो,
ऐसा अब मीत बनाना भूल गए,
वाणी से मधु टपकाना जो भूल गए,
देखो अब हर घर ने मधुमेह रोग को मोल लिए,
हर बात को जो हृदय से लगाना सीख गए,
अब हृदय रोग की बड़ी समस्या हमलोगो ने मोल लिए,
थाली दर थाली पचाना सीख गए,
पर मां बाप के डांट फटकार तक को पचाना भूल गए,
सच कहूं हम इंसान तो बन गए,
पर इंसानियत क्या है ? सीखना भूल गए,
बचपन भूल सब बड़े हो गए,
पर सच कहूं हम बड़प्पन करना भूल गए,
स्त्री कोख से हमनें जन्म लिए,
पर अफ़सोस कि हम उसका ही आदर करना भूल गए,
सच कहूं दोस्तों ऊंगली तो उठाना सीख गए,
पर खुद की ओर घुमी चार उंगलियों को देखना भूल गए,

@ रवि प्रभात श्रीवास्तव “मनीष”
मुख्य वाणिज्य निरीक्षक,
पूर्व मध्य रेल (मुख्यालय), हाजीपुर।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here