“आधुनिक हिंदी साहित्य में महाकाव्य परम्परा और शत्रुघ्न चरित” विषय पर समीक्षात्मक संगोष्ठी हुई ऑनलाइन सम्पन्न

    “हिंदी साहित्य भारती” के तत्वावधान में “आधुनिक हिंदी साहित्य में महाकाव्य परम्परा और शत्रुघ्न चरित” विषय पर समीक्षात्मक संगोष्ठी हुई ऑनलाइन सम्पन्न

अंतर्राष्ट्रीय संस्था “हिंदी साहित्य भारती” के तत्वावधान में गत दिवस ‘साप्ताहिक कार्यक्रम-श्रृंखला’ में ‘डॉ रवींद्र शुक्ल कृत महाकाव्य -शत्रुघ्न चरित’ पर समीक्षात्मक संगोष्ठी का आयोजन किया गया, जिसमें देशभर के साहित्य मनीषी एवं विद्वान समीक्षकों ने बहुत ही सारगर्भित समीक्षा एवं सार्थक चर्चा कर श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
भाव की प्रबलता तथा शिल्प लालित्य से मंडित यह महाकाव्य २१ सर्गों में समाहित है, अपनी मौलिक उद्भावनाओं एवं तार्किक विश्लेषण के कारण तर्क एवं आस्था का अद्भुत सम्मिश्रण यह ग्रंथ इतिहासकारों तथा समीक्षकों के लिए विराट कलेवर और प्रतिपाद्य प्रस्तुत करता है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ. श्यामसुंदर दुबे, मुक्तिबोध सृजन पीठ, सागर विश्वविद्यालय, ने की एवं मुख्यातिथ्य डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी पूर्व कुलपति संस्कृत विश्वविद्यालय उज्जैन ने किया। संचालन डॉ.अनिल शर्मा, उत्तराखंड, केन्द्रीय महामंत्री “हिन्दी साहित्य भारती” ने किया।
कार्यक्रम का शुभारंभ डॉ जमुना कृष्णराज, तमिलनाडु द्वारा प्रस्तुत भावपूर्ण ‘वाणी वंदना’ से हुआ।
कार्यक्रम में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए डॉ. श्याम सुंदर दुबे ने “हिन्दी साहित्य भारती” के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ.रवीन्द्र शुक्ल, केंद्रीय मीडिया संयोजिका डॉ.रमा सिंह एवं संयोजक मंडल द्वारा इस कार्यक्रम के सुसंचालन के लिए हार्दिक आभार व्यक्त किया।
उन्होंने कहा कि डॉ. रवींद्र शुक्ल द्वारा रचित महाकाव्य “शत्रुघ्न चरित” मेरी दृष्टि में अनुपम, अद्भुत, अद्वितीय, तथा विषय एवं पात्रों के साथ शास्त्रीय मानदंडों की दृष्टि से एक उत्कृष्ट ग्रंथ है। इसमें वर्णित आदर्श आधुनिक काल की महती आवश्यकता हैं। महाकाव्य की भाषा-शैली एवं विषयवस्तु अत्यंत रोचक, प्रेरक एवं प्रभावी हैं। शत्रुघ्न जैसा कर्मयोगी लेकिन साहित्य उपेक्षित पात्र कवि की लेखनी से मुखर हो उठा है। इस ग्रंथ मे शौर्य-शक्ति, बौद्धिक मंथन के साथ आस्था मूलक तथ्यों का अद्भुत प्रकटीकरण किया गया। यह चुनौतीपूर्ण कार्य डॉ शुक्ल ने बड़ी सहजता, निष्ठा एवं विलक्षणता के साथ किया है। डॉ. रवींद्र शुक्ल को इस महान कृति के लिए साधुवाद। हम उनके दीर्घायु होने की मंगल कामना करते हैं।
मुख्य अतिथि डॉ.मिथिला त्रिपाठी प्रसाद ने कहा कि डॉ रवीन्द्र शुक्ल ऐसे प्रतिभाशाली कवि हैं, जो कठिन से कठिन लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पुरुषार्थ एवं लगन के साथ निरंतर सक्रिय रहते हैं। इसी का सुपरिणाम है कि आपने लोक हितकारी महाकाव्य “शत्रुघ्न चरित” जैसे ग्रंथ की रचना कर अपनी काव्य क्षमताओं का श्रेष्ठ परिचय दिया। कविता अमर होती है। अपने सृजन के लिए डॉ रवींद्र शुक्ल ने शत्रुघ्न जैसे पात्र का चयन किया जो स्वयमेव शत्रुहंता है। ऐसे सद्ग्रंथ भारत वर्ष की चेतना बनकर राष्ट्रसेवा और समर्पण का भाव जाग्रत करके परमलक्ष्य की प्राप्ति का माध्यम बनते हैं। आपने संदेश देते हुए कहा कि “भले ही लक्ष्मण मत बनो, राम मत बनो, भरत मत बनो, परंतु शत्रुघ्न बनकर तो बताओ।” समीक्षात्मक अभिव्यक्ति देते हुए आपने डॉ.रवींद्र शुक्ल को साधुवाद दिया तथा उनकी लेखनी के सतत् सक्रिय बने रहने की मंगल कामना की।
“शत्रुघ्न चरित” पर शोध कर रही शोधार्थी स्नेह चौधरी ने अपने वक्तव्य में शोध के कुछ विशिष्ट बिंदुओं पर प्रकाश डाला।
डॉ. केशव शर्मा, आगरा ने “शत्रुघ्न चरित” के विविध सर्गों से उद्घृत ‘मंगलाचरण’ की भावपूर्ण प्रस्तुति दी।
विषय प्रवर्तन डॉ. रमा सिंह ने किया। “आधुनिक हिंदी साहित्य में महाकाव्य परंपरा और शत्रुघ्न चरित” पर प्रकाश डालते हुए आपने “वर्तमान परिपेक्ष्य में ‘शत्रुघ्न चरित’ की प्रासंगिकता” को भी रेखांकित किया। एक उत्कृष्ट महाकाव्य महान कलेवर, महान प्रतिपाद्य, उदात्तता, धीरोदात्त नायक के जीवनवृत्त के साथ ही नैतिक मूल्यों एवं महान धार्मिक तत्वों से समन्वित तथा प्रतीकात्मक रूप में समयानुकूल संदर्भों से भी संबद्ध होना चाहिए।
इन काव्य शास्त्रीय बिंदुओं पर ‘शत्रुघ्न चरित’ की विवेचना करें तो इस महाकाव्य में उदात्तता, आदर्शों और आकांक्षाओं, भाव व्यंजना तथा मनोहारी प्राकृतिक छटाओं का सांगोपांग उद्घाटन है।
आपने बताया कि डॉ. शुक्ल ने अपनी कृति में शास्त्रों, उपनिषदों, भारतीय दर्शन तथा वांग्मय के सारभूत तत्वों को समाहित करते हुए वर्तमान परिपेक्ष्य में काव्य विमर्श किया है। इसमें जहाँ महा वीर शत्रुघ्न के अनूठे कर्मयोग को रेखांकित किया गया है वहीं रामचरित मानस एवं वाल्मीकि रामायण के विवादित प्रसंगों का तार्किक विश्लेषण एवं समुचित व्याख्या भी की गई है।
कवि की मर्मभेदी दृष्टि से आवृत सत्य अनावृत हो उठे हैं। ऐसे समय में जबकि हमारे सांस्कृतिक जीवन मूल्यों, हमारे आस्था केंद्रों तथा भारतीय चिंतनधारा पर आघात हो रहे हों, इसमें अंतर्निहित तार्किक विवेचनाओं के माध्यम से गलत व्याख्याओं एवं भ्रांतियों को यथासंभव सही अर्थों में निरूपित करने का महत् कार्य वंदनीय है।
तत्पश्चात शोधार्थी शुभम चौहान ने ‘शत्रुघ्न चरित’ कुछ भावप्रवण काव्यांशों का भावपूर्ण वाचन किया।
“शत्रुघ्न चरित” के संदर्भ में “अनुभूति” प्रस्तुत करते हुए राष्ट्रीय कवि योगेन्द्र शर्मा, राजस्थान ने विविध प्रसंगों का बहुत ही हृदयस्पर्शी चित्रण किया। अपनी भावानुभूति अभिव्यक्त करते हुए आप अत्यंत भावुक हो उठे। आपने अश्रु विगलित वाणी में कवि शुक्लजी की मौलिक लेकिन सटीक उद्भावना ‘कैकेयी के त्याग’ को उकेरा, जिसने माँ के त्याग और समर्पण का महान उदाहरण प्रस्तुत किया तथा जनकल्याण के लिए ऋषि-मुनियों के साथ विमर्श के अनुरूप श्री राम को वन भेजकर सदा सर्वदा के लिए कुमाता होना स्वीकार कर लिया।
आपने शुभकामना स्वरूप अपनी कुछ पंक्तियाँ प्रस्तुत की-
“वि्प्र, संत, ब्राह्मण, कविपुंगव रंच कृपा की वर्षा कर दें,
काव्य यज्ञ में पूर्णाहुति दे, निज कर ‘रवि’ के सिर पर धर दें।
तभी फलित होगा श्रम कवि का, महाकाव्य गरिमा पाएगा,
पारायण होगा तब घर-घर, आदर्शों का युग आएगा।।”
इसी क्रम में डॉ. सुरेश शर्मा, हरियाणा ने भी “शत्रुघ्न चरित” के प्रमुख अंशों का भावपूर्ण वाचन प्रस्तुत किया।
तत्पश्चात समीक्षाकार डॉ. सुधीर शर्मा, भोपाल ने इस महाग्रंथ की अत्यंत उत्कृष्ट, समीचीन विवेचनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की।
आपने कहा कि सांस्कृतिक पराभव के इस युग में डॉ रवींद्र शुक्ल ‘रवि’ द्वारा प्रणीत महाकाव्य ‘शत्रुघ्न चरित’ भारतीय संस्कृति की पुनर्प्रतिष्ठा करने वाला महाकाव्य है।’शत्रुघ्न चरित’ एक विराट सांस्कृतिक आख्यान है। श्री शुक्ल बाल्यकाल में अपने पूज्य पिताश्री को ‘रामचरित मानस’ का पाठ सुनाया करते थे। रामकथा का जो बीज बाल्यकाल में श्री शुक्ल के मानस में पड़ा ‘शत्रुघ्न चरित’ इसी बीज से विकसित हुआ विराट वृक्ष है जो युगों-युगों तक रामकथा अनुरागियों को अपनी शीतल छाया में आश्रय प्रदान करता रहेगा।कवि की मौलिक उद्भावना है कि राम और लक्ष्मण चौदह वर्षों के लिए वन चले गए।भरत नंदी ग्राम में रहे।इस परिस्थिति में रामराज्य के क्रियान्वयन का दायित्व तो शत्रुघ्न पर ही था जिसे वे निस्पृह भाव से धरातल पर उतारते रहे। शत्रुघ्न के सपनों की राज्य व्यवस्था तो आदर्शों की पराकाष्ठा है। *शत्रुघ्न के चरित्र पर केंद्रित ‘शत्रुघ्न चरित’ हिंदी साहित्य का पहला महाकाव्य है।*
अंत में संचालन कर रहे डॉ.अनिल शर्मा ने कार्यक्रम अध्यक्ष डॉ श्याम सुन्दर दुबे, मुख्य अतिथि डॉ. मिथिला प्रसाद त्रिपाठी, केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. रवीन्द्र शुक्ल, डॉ रमा सिंह, डॉ. सुधीर शर्मा, श्री योगेंद्र शर्मा तथा संयोजन समिति सहित सभी विद्वानों, साहित्य मनीषियों, श्रोताओं एवं मीडिया संवाददाताओं का आभार प्रदर्शन किया।
कार्यक्रम में संस्था के चंचला दवे, अनीता मिश्रा, रामचरण “रुचिर”, सूरजमल मंगल, डॉ.अन्नपूर्णा, वी.पी.सिंह, डॉ. विमल सिंह, डॉ.राजेन्द्र शुक्ल, डॉ.लता चौहान, डॉ. सुरभि दत्त, डॉ सुखदेव माखीजा, नरेंद्र व्यास, विनोद मिश्रा, डॉ वंदना सेन, पुष्पा मिश्रा, जगदीश शर्मा आदि सहित बड़ी संख्या में उपस्थित समूह के सभी सदस्यों ने ऑनलाइन कार्यक्रम का आनन्द लेते हुए अपनी प्रतिक्रियाएँ देकर विद्वान मनीषीगण का आभार व्यक्त कर उनका उत्साहवर्धन किया। कार्यक्रम बहुत ही उपयोगी, ज्ञानवर्धक एवं सराहनीय बताते हुए सभी ने भूरि- भूरि प्रशंसा की।

राम चरण “रुचिर” द्वारा

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