काव्यभाषा : भारत की धरती -शशि बाला हजारीबाग

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भारत की धरती

ठहर ठहर पग धरो मुसाफिर,
यह भारत की धरती है।
महादेव की जटाजूट से,
गंगा यहाँ उतरती है।

पर्वत ,झरने,जंगल सुंदर,
बाग बावड़ी मनभावन।
तीर्थ अनेकों इस धरती पर
काशी ,मथुरा,वृन्दावन।

दसों दिशा में मुरलीधर की
वंशी बजती रहती है।
महादेव की जटाजूट से
गंगा यहाँ उतरती है।

धर्म विविध हैं लेकिन मन में ,
देश धर्म ही बसता है।
मर मिटने को तत्पर हरदम,
बच्चा -बच्चा रहता है।

ओढ़ तिरंगा घर आने की
हसरत सबको रहती है।
महादेव की जटाजूट से
गंगा यहाँ उतरती है।

वेद उपनिषद थाती इसकी,
है उन्नत विज्ञान जहाँ ।
देवभूमि यह,तपोभूमि यह,
बसते अपने प्राण यहाँ ।

भक्ति भाव की अनुपम धारा
अविरल बहती रहती है।
महादेव की जटाजूट से
गंगा यहाँ उतरती है।

राम, कृष्ण ,गौतम के पग रज,
बिखरे इसके कण कण में।
बसा तिरंगा श्वासों में औ,
जन गण मन है धड़कन में।

देश भक्ति की ज्वाला मन में
सबके जहाँ धधकती है।
महादेव की जटाजूट से
गंगा यहाँ उतरती है।

ठहर ठहर पग धरो मुसाफिर
यह भारत की धरती है
महादेव की जटाजूट से
गंगा यहाँ उतरती है।

शशि बाला
हजारीबाग

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