काव्यभाषा : पुरानी किताब -शिरीष पाठक, पटना

Email

पुरानी किताब

एक पुरानी सी किताब की खुशबु आती है अब तुमसे
ऐसा लगता है पढ़ लिया है तुमको कई बार
और तुम्हारे मुड़े हुए पन्नों को दोहरा लेता हूँ रोज़ एक बार
क्यूंकि तुम्हारे नाम की किताब दिल के बेहद करीब रखता हूँ मैं

अच्छा लगता है तुम्हारी सियाही को महसूस करना
अपनी आँखों और अपने हाथों से
जानती हो कभी कभी कुछ सुख चुके फूल मिल जाते है
जिनकी खुशबु आज भी आती है उन पन्नों की खुशबु के साथ

मेरे हाथों में अब रोज़ नज़र आती हो तुम
कभी मेरे सिरहाने रखता हूँ तुमको
और कभी मेरे सीने पे रख के सो जाता हूँ मैं
तुम्हारे बिना मेरे दिन का बीतना मुश्किल होता है

तुमको मैं बहुत कुछ कह देना चाहता हूँ तुमको रोज़
जिससे तुम मेरे अन्दर पनप रहे उन सब एहसासों को जान पाओ
लेकिन एक डर छिपा रहता है मेरे अंदर
कहीं मेरी कोई बात तुमको बुरी न लग जाए और तुम रूठ न जाओ मुझसे

मेरे लिए तुम मेरे जीवन की किताब के उन पन्नों की तरह हो
जो मैं पढता हूँ और अपनी कहानी को पूरा करने में जोड़ देता हूँ
और हर पन्ने में खुशबु आती है तुम्हारी
बिलकुल वैसे ही जैसे की गुलाब महकता है किसी किताब के पन्नों के बीच में

शिरीष पाठक
आशियाना मोड़
पटना

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here