काव्यभाषा : ज़ख़्म – ऋचा गुप्ता नीर आगरा

Email

ज़ख़्म

मिटटी पे मेरे ज़ख्मो की ,हसीं लम्हे कहाँ सजते हैं
गीली पलकों की तराई पे ,ताज़े ख्वाब कहाँ रुकते हैं

बदहवास साँसों को सुकूं नहीं ,सीने की गहराई में
अपनों के नश्तर हर घडी ,जहाँ धड़कनो में चुभते हैं

मेजबान दिल बेबस मेरा ,दर्द मेहमाँ बना बैठा है
सन्नाटों के शोर यहाँ ,किसी तन्हाई में सिसकते हैं

राख़ फैली है फ़िज़ा में ,दम तोड़ चुके अरमानों की
ज़ीस्त के कुछ पन्ने इसकदर ,चुन चुन के जलते हैं

बेवफाई मुकद्दर की यारों ,भारी है अब भी साँसों पर
बेखबर ज़ज़्बात मेरे ,देख देख हाथ मलते रहते हैं

ऋचा गुप्ता नीर
आगरा

4 COMMENTS

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here