काव्यभाषा : न गगन को छुआ,न धरा के रहे -डॉ.अवधेश तिवारी’भावुक’ दिल्ली

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न गगन को छुआ , न धरा के रहे,
मेरा जीवन तो सर – सर पवन सा बहे।

चाहता था , मैं नभ को ,छुऊँहाथ से,
मैं बढाऊँ कदम , आत्मविश्वास से।

पर मुझे राह में , धोखे मिलते रहे,
न गगन को छुआ , न धरा के रहे।

फिर भी हिम्मत , कभी मैंने हारी नहीं,
मैंने सब कुछ किया, जो लगा है सही।

घाट भी न मिला घर के भी न रहे,
न गगन को छुआ , न धरा के रहे।

दर्द जो भी मिला, मैंने हँस के सहा,
न ही शिकवा किया , न कभी कुछ कहा।

फिर भी आँखों से , आँसू की धारा बहे,
न गगन को छुआ , न धरा के रहे।

जिसने जो भी कहा, मैंने वो सब किया,
माँगा जिसने भी जो , मैंने वो सब दिया।

पर सफलता ने , ‘भावुक’के पग न गहे,
न गगन को छुआ , न धरा के रहे।

डॉ.अवधेश तिवारी’भावुक’
दिल्ली

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