साहित्य : युवा वर्ग का साहित्य कैसा हो…! -डॉ.योगेन्द्र सिंह ,इंदौर

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युवा वर्ग का साहित्य कैसा हो…

साहित्य कैसा हो और क्यों हो? यह एक विचारणीय प्रश्न है। आजकल देखा जा रहा है। समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग जिसे हम युवा वर्ग कहते हैं, जोकि निश्चित ही आने वाला कल है और समाज का भविष्य भी। आज का युवा साहित्य से दूर होता जा रहा है या फिर साहित्य की उस विधा की ओर बढ़ रहा है जोकि स्वस्थ समाज की परिकल्पना के प्रतिकूल है क्योंकि आरंभ में ही यह प्रश्न उठा है? कि साहित्य कैसा हो या हम यह कहें कि युवा पीढ़ी को किस प्रकार के साहित्य की जरूरत है। पारिभाषिक रूप से साहित्य की कई परिभाषाएं विद्वानों द्वारा दी गई हैं, लेकिन सभी साहित्य की परिभाषाओं का मूल सार यही है कि साहित्य का समाज उपयोगी होना बहुत आवश्यक है क्योंकि साहित्य के माध्यम से ही सामाजिक चेतना और सामाजिक विकास का मार्ग प्रशस्त होता है। आजकल का युवा जिस प्रकार के साहित्य में रुचि ले रहा है उस साहित्य के माध्यम से समाज में जो प्रतिकूल विकृति आ रही है, वह अत्यंत गंभीर है। युवा ज्यादातर सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक, टि्वटर, व्हाट्सएप इत्यादि के माध्यम से जो आधारहीन साहित्य परोसा जा रहा है, उसका गुलाम बनता जा रहा है। युवा साहित्य ऐसा होना चाहिए जो मानव को मानव बनाए। आजकल का युवा संस्कार से परिपूर्ण ना होकर आधुनिकता के नाम पर अपनी संस्कृति एवं सभ्यता को गर्त में ले जा रहा है जो बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। इन्हीं सब कारणों से उचित साहित्य का निगमन युवा पीढ़ी में होना अत्यंत आवश्यक है ताकि हम अपने खोए हुए सांस्कृतिक वैभव को पुनः प्राप्त कर सकें। साहित्य ऐसा हो जो युवा पीढ़ी को अपने सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित कराएं जो राष्ट्र उपयोगी हो और राष्ट्र निर्माण की नींव रखे, क्योंकि साहित्य आदि काल से ही समाज में जागरूकता, राष्ट्रवाद की चेतना का स्रोत रहा है। साहित्य के माध्यम से ही सामाजिक परंपराओं, वैचारिक प्रेरणा और राष्ट्रवाद का विकास हुआ है।साहित्य के माध्यम से ही हम अपने महापुरुषों,पूर्वजों एवं मानव विकास के विभिन्न पहलुओं से परिचित होते हैं। यह साहित्य ही है जो युवा पीढ़ी में प्रेरणा और राष्ट्रप्रेम जागृत कर सकता है। इसलिए उचित साहित्य का अनुसरण करना युवा पीढ़ी के लिए अत्यंत आवश्यक है ताकि वह भविष्य की विषम परिस्थितियों के लिए तैयार रह सके। साहित्य सदैव एक औषधि के रूप में समाज के काम आया है। अतः साहित्य से युवा पीढ़ी का जुड़ना और एक ऐसे समाज का निर्माण करना जो सदैव मानवता के काम आए आज की जरूरत है।

– डॉ.योगेन्द्र सिंह
इंदौर

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