काव्यभाषा : हमदर्द -डॉ.अखिलेश्वर तिवारी पटना

Email

हमदर्द

काट कर फेंक रहा है वो देश के सारे सड़े बन्धनों को।
फिर से स्थापित करने की कोशिश है सनातनी मानदंडों को।

भौंचक्का होकर सभी देखते रह गए खुली आँखों से उसे।
एक दिन आखिर ठीक कर ही दिया ऋषि कश्यप के चमन को।

कोई नहीं जानता था इस मुल्क में कि सचमुच वो देवदूत है।
अपने पराये से हमेशा ऊपर देशको रखना उसकी पुरानी रीत है।

लोगों के जेहन में रहता है और लोगों को हीं जेहन में रखता है।
वास्तव में वो कलन्दर है देश के लिए कुछ भी कर सकता है।

जो जो वादे किया था उसको पूरा करने की कोशिश कर रहा है।
देश में बैठे देशद्रोहियों की आँखों मे वो आज खटक रहा है।

बाहरी पैसों पर पलनेवाले जयचंदों से वो पूरी तरफ वाकिफ है।
एक एक कर इन लाइलाज बीमारियों का वो इलाज कर रहा है।

आज मीडिया हो या और मंच हर जगह बिलबिला रहे हैं ये लोग।
रह रह के पत्र लिख रहे हैं हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं ये लोग।

जोगाड़ू पुरस्कार तो लौटा चुके हैं पागलों की तरह बोलते हैं लोग।
जो सुर देश के विरुद्ध उठते हैं उनके सुर में सुर मिला रहे हैं लोग।

मजहब के आधार पर वो आवाम में कोई भेदभाव नहीं करता है।
हर समस्याओं का आयुर्वेदिक तरीके से वो इलाज करता है।

फिर भी कुछ परजीवी बाज नहीं आ रहे हैं दुर्गंध फैलाने से।
भयभीत बिल्कुल नहीं है वो वल्कि वैक्सीन से इलाज करता है।

डॉ. अखिलेश्वर तिवारी
पटना

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here