बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा – अनेकता, एकता और हम – डॉ. वर्षा सिंह

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा

अनेकता, एकता और हम

– डॉ. वर्षा सिंह

हमारा देश अनेकता में एकता का परिचायक है। भले ही यहां अनेक जातियां, अनेक धर्म, अनेक भाषाएं, विभिन्न संस्कृतियां, अनेक आर्थिक – सामाजिक विषमताएं हैं किन्तु आपदा के समय सदैव सभी देशवासी एकसूत्र में बंध कर इस प्रकार राष्ट्र की एकता व अखंडता को अक्षुण्ण रखने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं, मानो रंगबिरंगे धागों से बुना गया वस्त्र सुदृढ़ आवरण बन कर हर परिस्थिति का मुक़ाबला करने को तत्पर हों।
मैंने प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करते समय एक कथा पढ़ी थी। कभी न कभी यह कथा आप सभी ने पढ़ी होगी। किसी गांव में एक किसान था। उसके चार बेटे थे। वे सभी बहुत मेहनती और ईमानदार थे। लेकिन किसी न किसी बात पर वे आपस में झगड़ने लगते थे। समझाने पर भी वे किसी बात पर आपस में सहमत नहीं होते थे। यह सब देख किसान को बहुत दुख होता था।
एक बार किसान बीमार पड़ गया। बीमारी में उसे यह चिन्ता सताने लगी कि यदि उसे कुछ हो गया तो उसके बाद उसके इन चारों झगड़ालू बेटों का क्या होगा। अचानक उसे एक तरक़ीब सूझी। उसने बहुत सी लकड़ियां इकट्ठी करवाईं और उनका एक गट्ठर बनवाया। फिर किसान ने अपने चारों बेटों को बुलवाया और उन्हें बारी-बारी से वह गट्ठर तोड़ने को दिया। अपनी पूरी ताक़त लगाने के बावज़ूद कोई भी उसे नहीं तोड़ पाया। तब किसान ने उस गट्ठर को खुलवा दिया और सबको एक-एक लकड़ी उठा कर अलग-अलग तोड़ने को कहा। एक-एक लकड़ी अलग-अलग तोड़ना बहुत आसान था। देखते ही देखते सबने तत्काल गट्ठर की सारी लकड़ियां अलग-अलग उठा कर तोड़ दीं। तब किसान ने सब को समझाया कि जिस प्रकार एक रस्सी में बंधी सारी लकड़ियों को तोड़ पाना मुश्किल है, उसी प्रकार यदि आपस में लड़ना-झगड़ना छोड़ कर, तुम सब मिल-जुल कर रहोगे तो तुम्हें कोई हानि नहीं पहुंचा पाएगा और तुम लोग हर मुसीबत का सामना चुटकियों में कर लोगे। अलग-अलग रहना ठीक नहीं होता है।
यह सारी बात किसान के चारों बेटों को अच्छी तरह से समझ में आ गई और फिर सब मिल-जुल कर रहने लगे। किसान की चिन्ता दूर हुई और वह भी स्वस्थ-प्रसन्न रहने लगा। इस कथा का सार यह है कि एकता में बहुत बल होता है।
वस्तुतः किसी मुद्दे पर एक होने की अवस्था या भाव को ही एकता कहते हैं और उद्देश्य, विचार आदि में सभी लोगों का मिलकर एक होना ही एकता है। एक हो कर रहना अर्थात् संगठित हो कर रहना। संगठन ही सभी शक्तियों का मूल है। एकता के बिना किसी भी राष्ट्र की उन्नति सम्भव नहीं है। एकता की शक्ति का कोई मुक़ाबला नहीं है। मेरे एक सम्माननीय मित्र हैं अरविंद जैन ‘रवि’ जो व्यवसाय से अधिवक्ता हैं, समाजसेवी हैं और पठन-पाठन में गहन रुचि रखते हैं। उन्होंने व्हाट्सएप पर एक रोचक लघुकथा शेयर की । वह लघुकथा कुछ इस प्रकार है –
एक बार हाथ की चारों उंगलियों और अंगूठे में आपस में झगड़ा हो गया। वे पांचों खुद को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने की कोशिश में लगे थे। अंगूठे ने कहा कि मैं सबसे बड़ा हूं, उसके पास वाली उंगली ने कहा कि मैं सबसे बड़ी हूं। इसी तरह सभी उंगलियां स्वयं को एक दूसरे से बड़ा सिद्ध करने में लगी थीं। जब आपस में निर्णय नहीं हो पाया तो वे सभी अदालत पहुंचे।
न्यायाधीश ने सारा वाक़या सुना और उन पांचों से कहा कि आप लोगों को यह सिद्ध करना होगा कि आप सभी किस तरह एक-दूसरे से बड़े हैं। तब अंगूठे ने कहा कि मैं सबसे ज़्यादा पढ़ा लिखा हूँ क्योंकि लोग हस्ताक्षर के स्थान पर अंगूठा-निशानी (थंबप्रिंट) के रूप में मेरा ही इस्तेमाल करते हैं। तब पास वाली उंगली बोली कि मैं तर्जनी हूं। लोग मुझे किसी इंसान की पहचान के तौर पर इस्तेमाल करते हैं और लोगों को नियंत्रित करने के लिए मेरा एक इशारा ही काफी होता है। उसके बाद वाली उंगली ने कहा कि अरे, मुझे इंच-टेप से नाप लीजिए। लम्बाई में तो मैं मध्यमा ही सबसे बड़ी हूं। उस लम्बी उंगली के बाद वाली उंगली बोल उठी कि मैं अनामिका, मैं सबसे ज़्यादा अमीर हूं क्योंकि लोग हीरे-जवाहरात, रत्न-स्वर्ण आदि की अंगूठी मुझमें ही पहनते हैं। छोटी उंगली कहलाने वाली उंगली ने कहा कि मेरा नाम कनिष्ठा है, मैं छोटी ज़रूर है, लेकिन बड़प्पन में मैं किसी से कम नहीं हूं। मेरे प्रयोग के बिना बांसुरी के सारे स्वर नहीं बज सकते हैं। इस तरह सभी ने स्वयं को बड़ा सिद्ध करने का प्रयास किया।
न्यायाधीश ने सबकी दलीलें सुन कर एक लड्डू मंगाया और अंगूठे से कहा कि इसे उठाओ, अंगूठे ने भरपूर ज़ोर लगाया लेकिन लड्डू को नहीं उठा पाया। इसके बाद सारी उंगलियों ने एक -एक करके कोशिश की लेकिन सभी विफल रहे। अंत में न्यायाधीश ने सबको मिलकर लड्डू उठाने का आदेश दिया तो झट से सबने मिलकर लड्डू उठा लिया। फ़ैसला हो चुका था, न्यायाधीश ने फ़ैसला सुनाया कि तुम सभी एक दूसरे के बिना अधूरे हो और अकेले रहकर तुम्हारी शक्ति का कोई अस्तित्व नहीं है, जबकि संगठित रहकर तुम कठिन से कठिन काम आसानी से सम्पादित कर सकते हो। संगठन अर्थात् एक-दूसरे से सहयोग करने और एकता बनाए रखने में बहुत शक्ति होती है।
वर्तमान समय में इस कोरोनाकाल में हम सभी इस बात का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं कि एकता बनाए रखने अथवा संगठित होने के लिए शारीरिक समीपता ही महत्वपूर्ण नहीं होती बल्कि उसमें भावात्मक, मानसिक, बौद्धिक और वैचारिक निकटता की समानता आवश्यक है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए भी एकता बनाए रखी जा सकती है। हम कठिन से कठिन हर परिस्थिति का मुक़ाबला एकजुटता से कर सकते हैं।

और अंत में मेरी काव्यपंक्तियां प्रस्तुत है –

अनेकता में एकता ही हमारी शक्ति है,
देशभक्ति की डगर, अलग नहीं रही कभी।
जहां पे ”वर्षा” हो रही है, गोलियों की इन दिनों
वहां पे अम्नो-चैन की, बजेगी बांसुरी कभी।

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सागर, मध्यप्रदेश

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