संस्मरण : माँ -अनामिका सिंह ,चन्द्रपुर महाराष्ट्र

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संस्मरण : माँ

“माँ ” शब्द में ही पूरी दुनिया समाहित है। ईश्वर ने माँ को पूरी दुनिया से अलग बनाया है। असीम धैर्य, संतोष ,नेह और संवेदनाओं से परिपूर्ण बनाया है। तभी तो दुनिया की मुसीबतों से मां अपने बच्चों को बचाती है। सही- गलत का फर्क समझाती है। अपने बच्चों की नादानियों को नजरअंदाज करके उसे माफ करती है , उसे सुधार का अवसर देतीऔर फिर से एक नई प्रेरणा शुरुआत करती है।
मेरी मां तो इस संसार की सबसे अच्छी मां है। उनका हर एक रुप मैंने समय के साथ बिल्कुल अलग अंदाज में देखा है। 15 साल की उम्र में वह चार बेटियों की मां बन गई। 16 साल में मैं उनकी गोद में आ गई। मेरी दादी बताती है कि मैं अपने पापा की पांचवी बेटी थी । पर उन्होंने मुझे बड़े प्यार से पाला। मेरे जन्म के बाद उन्होंने मेरे दूध पीने के लिए गाय खरीदी थी। कभी मुझे नहीं लगा कि मैं अपने पापा की पांचवी बेटी हूं।
मेरी मौसी के मरने के बाद मेरे नाना-नानी दुख के समंदर में डूब गए। उनको यह चिंता सता रही थी कि उनकी चार- चार नातिनों को किसी पराए घर की लड़की अपना पाएगी ? मम्मी के सामने शादी का प्रस्ताव रखा गया। मम्मी ने मना नहीं किया। मैं अक्सर सोचती हूँ “क्या मैं उनकी जगह पर होती तो ऐसा कर पाती ?”
मम्मी कब जगती, कब ब्रश करती, कब अपना पूरा काम करती मैंने कभी नहीं देखा। परिवार बड़ा था नौकर- चाकर ,मैनेजर सब का खाना- पीना मम्मी ही बनाती थी। बड़ी बहने मम्मी की मदद करती थी। कितना अनुशासन था घर में ! आज 4 लोगों का खाना बनाने में बिना कुछ बोले हमारा काम नहीं चलता । ज्यों- ज्यों उम्र गुजर रही है मां के प्रति प्यार और गहरा होता जा रहा है।
दसवीं कक्षा तक मेरी बातचीत मम्मी से बस खाना- पहनना तक सीमित था। हाँ, पापा से मुझे बड़ा लगाव था। मम्मी की सारी कसर पापा से पूरी हो जाती थी। जब मैं थोड़ी बड़ी हुई और दसवीं के बाद बाहर पढ़ने गई। तब मम्मी की कीमत समझ में आई।
बहनों की शादी हुई। उनके बच्चे हुए। सबकी सेवा मम्मी ने बड़ी लगन से की। सारी जिम्मेदारी उन्होंने बिना उफ किए पूरी की । मेरी बड़ी दीदी मम्मी से मात्र 8 साल छोटी थी ।इतनी कम उम्र में इतनी जिम्मेदारी ! मेरे इलाके के सारे लोग मेरे मम्मी – पापा की मिसाल देते हैं। इतना प्यार, इतना सामंजस्य! जब भी कोई समस्या आती है मम्मी- पापा इतनी आसानी से हल निकाल देते हैं कि मैं नतमस्तक हो जाती हूँ ।
एकदम गोरी, भूरे बालों वाली मेरी मां देवी जैसी ही लगती हैं ।अब तो उनके बाल थोड़े सफेद हो रहे हैं। पर उनके चेहरे का नूर और आंखों की चमक आज भी बरकरार है। उनका नाम अनुराधा सिंह है। उनके पापा हाई स्कूल टीचर थे। उनके नाना भी टीचर थे। शायद यह गुण उन्हें विरासत में मिला था। तभी पूरे परिवार को उन्होंने इतनी अच्छी तरह संभाला ।
कम उम्र की होते हुए भी अपने गुणों से उन्होंने सबके दिल में अपने लिए जगह बनाई। पापा ने कभी उनके काम में दखलंदाजी नहीं की । आज दोनों बेटे और दोनों बहुए भी उनके लिए जान देते हैं और मम्मी भी अपनी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त होकर अपना प्यार दोनों छोटी पोतियों पर लुटा रही हैं । मुझे मम्मी बहुत सख्त लगती थी। शायद जिम्मेदारियों ने उन्हें ऐसा करने पर मजबूर किया । आज मम्मी की प्यारी मुस्कान उनके बच्चों के बच्चों के लिए लौट आई है ।
मम्मी के इन्हीं गुणों के कारण मैं उनसे प्यार ही नहीं करती बल्कि उनकी पूजा करती हूँ । ईश्वर उन को लंबी उम्र दे ताकि हमें उनका प्यार और आशीर्वाद मिलता रहे।

अनामिका सिंह
चन्द्रपुर महाराष्ट्र

2 COMMENTS

  1. बहुत सुंदर संस्मरण अनामिका जी। मां होती ही ऐसी है। ब्रह्मा भी मां की महिमा नहीं बता सकते क्योंकि उनकी तो मां थी ही नहीं। सृष्टि रचना अलग बात है।

    • अपने घर परिवार बच्चों के सुखों के लिए सर्वस्व अर्पण करने वाली अभूतपूर्व प्रतिभा की धनी होती है माँ.. इसके गुणों का बखान करने के लिए शब्द निःशब्द हो जाते हैं…।
      बहुत उम्दा संस्मरण सभी के मन की बात।हार्दिक बधाई

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