काव्यभाषा : आस – डॉ. साधना अग्रवाल, ग्वालियर (म.प्र.)

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आस

कभी सूखी रोटी खाते, कभी छप्पन भोग भी पाते,
करते न कभी शिकायत, मन-मौजी वक्त बिताते,
मन-मौजी वक्त बिताते।
कभी सूखी रोटी खाते….

बचपन के मीठे सपने, असीम उड़ाने भरते,
गरीब दुःखों की पीड़ा, कभी बयां न करते,
कभी बयां न करते।
कभी सूखी रोटी खाते….

जब यौवन ले अंगड़ाई, जीवन की शुरू चढ़ाई,
चले अनजान डगर में, संग लेकर साथ बिहारी,
संग लेकर साथ बिहारी।
कभी सूखी रोटी खाते….

समय चक्र का पहिया, लावे मुसीबत बीमारी,
दे देवे कठिन परीक्षा, हारे न जनक दुलारी,
हारे न जनक दुलारी।
कभी सूखी रोटी खाते….

रेशम रिश्तों की डोरी, विश्वास प्रेम से बनती, कर्म भाव से सिंचित, अहं को जगह न मिलती,
अहं को जगह न मिलती।
कभी सूखी रोटी खाते….

कष्टों में रहने वाले, आनंद की छांव में सोते,
हर दिन का नया सबेरा, साधना की आस है होते,
साधना की आस है होते।
कभी सूखी रोटी खाते….

डॉ. साधना अग्रवाल,
ग्वालियर (म.प्र.)

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