काव्यभाषा : तुम -ऋचा गुप्ता नीर , आगरा

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तुम

मेरे हर्फो में ,मेरे ज़ज्बों में ,गहरे रहते हो तुम
हर घडी ,लहू संग ,रग रग में बहते हो तुम

तुमसे शुरू ,तुमपे ख़तम ,दुनिया सिमटी है मेरी
चाहत पे फिर भी तोहमत की ,बातें कहते हो तुम

इंतज़ार में तेरे ,सदियों सी गुजरती हैं घड़ियाँ
मुझसे जुदा इतने सुकूं से ,कैसे रहते हो तुम

स्याह रातों में ,तेरी यादों की तपिश ,जलाती है मुझे
इस तड़प को ,बिन मिले कैसे ,सहते हो तुम

ऋचा गुप्ता नीर
आगरा

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