0 तरकश – प्रेमशंकर चौधरी : सादर विनम्र स्मरण – विनोद कुशवाहा

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प्रेमशंकर चौधरी : सादर विनम्र स्मरण

– विनोद कुशवाहा

नर्मदांचल के वरिष्ठ साहित्यकार तथा विपिन परम्परा के कवि गीतकार प्रेमशंकर चौधरी नहीं रहे लेकिन साहित्य के क्षेत्र में उनका उल्लेखनीय योगदान हमेशा याद रखा जाएगा । उनकी कश्ती कभी मझदार में नहीं रही मगर ” श्रीमती शांति देवी महादेव पगारे स्मृति समिति ” द्वारा प्रकाशित उनका काव्य संग्रह ‘ मझधार की कश्ती ‘ हमेशा उनका स्मरण कराता रहेगा ।

चौधरी जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था । सादगी उनकी पहचान थी और मौन उनकी ताकत । वे चुप रहकर भी बहुत कुछ बोल दिया करते थे । उनको देखकर विपिन जी के गीत की पंक्तियां याद आ जातीं – अम्बर में आंखें खोल जिया करता हूं , चुप हूं पर तुमसे बोल लिया करता हूं ।

राजनीति में रहकर भी जैसे वे राजनीति में नहीं थे । साहित्य हमेशा उनकी प्राथमिकता में रहा । समाज सेवा उनका लक्ष्य था । इसके लिए उन्होंने दोनों का सहारा लिया । राजनीति का भी और साहित्य का भी ।

पुरानी इटारसी में जितनी भी साहित्यिक गतिविधियां आयोजित होतीं थीं उनमें वे अग्रणी रहते थे । हर रचनात्मक गतिविधि में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती थी ।

नत्थूसिंह चौहान , सी बी काब्जा , टी आर चोलकर , एस सी जोशी , चाँदमल चाँद , बद्रीप्रसाद वर्मा उनकी साहित्यिक यात्रा में सहभागी रहे तो युवा पीढ़ी को उन्होंने हमेशा मार्गदर्शन दिया ।

वे एक अच्छे श्रोता थे परंतु उन्होंने कभी कवि – सम्मेलन के मंचों पर जाने का मोह नहीं रखा । यदि कुछ स्वार्थी तत्वों ने अपना हित साधने के लिये उन्हें मंच पर जबर्दस्ती बिठाल भी दिया तो वे बेमन से सबका मन रखने के लिए बैठ जाते थे लेकिन ये उनकी सहजता थी । उनकी सरलता थी । उनका बड़प्पन था । … पर दिल से कभी उन्होंने मंचीय कवियों को तवज्जो नहीं दी । उनका विश्वास शाश्वत साहित्य में था । वे गोष्ठियों को देखकर , उसमें शामिल होकर बेहद प्रसन्नता का अनुभव करते थे । गुटबंदी उन्होंने कभी पसन्द नहीं की । एक बार उन्होंने मुझसे कहा था – ” विनोद अगर साहित्य के क्षेत्र में भी गुटबंदी देखने को मिलती है तो राजनीति और साहित्य में फर्क क्या रह जायेगा ? ” मैं क्या जवाब देता । चुप रह गया । सर झुका लिया । चंद लोगों के कारण दादा के सामने मुझे शर्मिंदा होना पड़ा ।

चौधरी जी हमेशा जोड़ने में विश्वास रखते थे । तोड़ने में नहीं । यही वजह थी कि वे पुरानी इटारसी और
इटारसी के बीच सेतु बने हुए थे । पुरानी इटारसी में उनकी प्रेरणा से जब भी कोई सृजनात्मक आयोजन होता तो इटारसी से वे सबको आमंत्रित करते । कोई भी उनसे नहीं छूटता । … और इधर इटारसी में हर रचनात्मक कार्यकम में वे जरूर शिरकत करते । बिना आमंत्रण की प्रतीक्षा किए ।

कहते हुई अपार दुख हो रहा है कि एस सी जोशी जी के बाद एक और स्तंभ ढह गया । चौधरी जी हमारे बीच नहीं रहे । अब किसी गोष्ठी में कोई मेरी पीठ पर हाथ नहीं रखेगा । उनकी तरह कोई मुझे सम्बल नहीं देगा । वैसे भी कतिपय कारणों से इटारसी में साहित्यिक गोष्ठियों का दौर खत्म सा होता जा रहा है । उसके लिए कौन जिम्मेदार है इसकी चर्चा फिर कभी ।

फिलहाल मेरे अग्रज , मेरे मित्र , मेरे सुख – दुख के साथी प्रेमशंकर जी चौधरी के पुत्र जयप्रकाश चौधरी से मेरी यही अपेक्षा रहेगी कि वे आगे बढ़कर अपने पिता की विरासत को भली भांति सम्भालें और उनकी वैचारिक परम्परा को आगे बढ़ायें । यही चौधरी जी को हम सबकी ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी । सादर पुण्य स्मरण । विनम्र स्मरण ।

श्रद्धेय दादा हम आपको कभी नहीं भूल पायेंगे । आप हमेशा याद रहेंगे ।

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