लघुकथा : साँप-सीढ़ी- चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

37
चरनजीत कुकरेजा भोपाल

साँप-सीढ़ी

“हलो…शालू !!सुनो…आज डिनर पर सक्सेना साहब को इन्वाइट किया है।एक दोस्त भी साथ आएगा उनके।पूरी तैयारी कर लेना।चिकनऔर दूसरे आइटम मैं लेता आऊँगा…।और देखो…जरा अच्छे से तैयार होना…।पिछली बार की तरह कमरे में बंद मत हो जाना …कंपनी देनी होगी तुम्हें…।हमारे काम में प्रतिस्पर्धा बहुत है।आगे निकलने के लिये करने पड़ते हैं कुछ अनचाहे समझौते…”
दूसरी तरफ कुछ हलचल होते न देख वह फिर बोला “क्यों तुम कुछ बोलती क्यों नही… *साँप* सूँघ गया है क्या…या आवाज सुनाई नही दे रही…।”
“क्या बोलूं मैं…बोलने से फायदा भी क्या…।तुम्हें तो अपना फायदा दिखता है बस… पैसे-वैसे दे कर क्यों नही करवा लेते काम…कम से कम मुझे तो मुक्ति मिलेगी तुम्हारी आये दिन की पार्टियों से…और तुम ऊपर चढ़ने के लिए बार-बार मुझे ही *सीढ़ी* क्यों बनाते हो…”
“अरे भई तुम समझती क्यों नही हो…सक्सेना साहब बहुत काम के आदमी हैं…वो लिफाफे-विफाफे नही लेते…उन्हें तो सब इसी तरह खुश करते हैं..।पता है प्रमोद ने पिछले दिनों इन्वाइट किया था इन्हें घर पर…।साल भर से रुके हुये सारे बिल दूसरे दिन ही पास हो गए…” फिर गहरी साँस लेते हुए बोला “रजनी के हाथ भी तो पीले करने है कि नही….मुझे भी अपने रुके सारे बिल पास करवाने हैं ….नए काम का टेंडर भरा है,उस पर भी अपने हित में बात करनी हैं…तुम्हारे सहयोग से मेरी मंजिल आसान हो जाएगी..हमारे-तुम्हारे बड़े-बड़े सपने तभी न पूरे होंगे…..”
“चलो ठीक है रखो फोन..मुझे शाम की तैयारी करनी है..”
शाम को उसने घर आते ही शालू को नॉनवेज के पार्सल के साथ ही बियर की बोतल भी थमा दी…।”अब क्या ड्रिंक भी घर पर ही लोगे..।”
“तो क्या ,सूखा डिनर करवाओगी…तुम्हे सर्व भी करना है…साड़ी भी वही वाली पहनना,जिसे देख कर मैं भी खुद पर काबू नही रख पाता हूँ…समझी!! ना नुकर तो करना ही नही.. उन पर ऐसी छाप छोड़ना की वह कल के कल ही मेरा काम कर दें…”
फिर इधर-उधर देखते हुए कहने लगा “रजनी नही दिखाई दे रही..कोचिंग से लौटी नही अब तक…आती है तो उसे ही किचन में रोटी सेंकने के लिये कहना।साहब के समाने मत आने देना..समझी.. !!और उनकी आवभगत में कोई कमी नही रहनी चाहिए…ये मौका हाथ से जाना नही चाहिए। जाओ तैयार हो जाओ अच्छे से…मैं भी फ्रेश हो कर आता हूँ…साहब भी आते ही होंगे…”
वह दोनों तैयार हो कर सक्सेना साहब की प्रतीक्षा कर रहे थे, कि शालू के फोन की घँटी बजी “मम्मी …आज कोचिंग से प्रीति के यहाँ आ गई हूँ।कुछ नोट्स लेने थे उससे…।मेरी स्कूटी भी पंचर हो गई है..। यहीं खड़ी कर दी है।उसके पापा छोड़ देंगे घर…वह थोड़ी देर में ही किसी के यहाँ पार्टी पर जा रहे हैं… मुझे घर छोड़ते हुए ही जायेंगे आगे….।”
“ठीक है…ठीक है..जल्दी आने की कोशिश करना..तुम्हारे पापा ने भी किसी को डिनर पर बुलाया है।”
जैसे ही डोरबेल बजी संजय ने शालू को दरवाजा खोलने का इशारा किया ।”जरा पल्लू तो ठीक कर लो…मुस्कराहट लाओ चेहरे पर…”
उसने खुद को थोड़ा ठीक-ठाक किया और संजय की ओर देखते हुए बोली”अब ठीक है…..” “हाँ भई ठीक है …अब जाओ जल्दी..”
शालू ने जैसे ही दरवाजा खोला तो सर से पाँव तक सिहर गई ।दरवाजे पर संजय के साहब और उनके दोस्त के बीच रजनी खड़ी थी।
शालू कुछ बोलती इसके पहले ही रजनी बोल पड़ी ” माँ यही हैं प्रीति के पापा।गाड़ी में बैठते ही इन्होंने मुझसे घर का पता पूछा तो कहने लगे मैं भी तो वहीं जा रहा हूँ…।आइए अंकल…”
शालू को भी अनचाहे ही उनका स्वागत करना पड़ा…।
सक्सेना जी की बहकी चाल पहले से ही उनके नशे में होने की गवाही दे रही थी।
“आइए सर….स्वागत है आपका..” संजय उन्हें ड्राइंगरूम के सोफे पर बिठाया। “अरे संजय …पहले कभी बताया नही तुम्हारी इतनी खूबसूरत बेटी भी है..वाह भई वाह मजा आ गया आज उसे देख कर”
“लाओ भई कुछ पानी- वानी लाओ ।साथ में नमकीन -वमकीन भी लाना…. रजनी से कह दो बना देगी पैग…”
सोफे की पुश्त पर पीठ टिकाते उनकी नजरें अपने दोस्त से मिली और इशारों ही इशारों में आज की शाम को रंगीन बनाने के संवाद होने लगे।उनकी नशीली आँखों में कुटिलता की झलकियाँ स्पष्ट दिखाई दे रही थी…।
और संजय में अपनी जगह से हिलने की या भीतर शालू या रजनी को पुकारने की हिम्मत ही नही बची थी। कैसे जुटाता वह हिम्मत..।रजनी से पैग बनवाने की उनकी ख्वाहिश सुन कर उसके कान गर्म होने लगे थे ..।वह अच्छी तरह भांप गया था कि, *सीढ़ी* पर चढ़ कर ऊपर पहुँचना आसान होता है ,पर मंजिल पाने के लिये सक्सेना जैसे *साँप* भी मुँह खोले कदम-कदम पर मौजूद रहते हैं…। उसे लगा शिखर तक पहुंचने के पहले ही जहरीले *साँप* ने उसे डस लिया है….और वह वापस वहीं आ गया है जहाँ से चला था…।

चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

3 COMMENTS

  1. Very heart touching story Aaj ke samay mein har vayakti progress chahta hai short cut raste se iske liye wo kuch bhi kar Sakta hai apne sanskar ki Bali de Sakta hai

  2. आधुनिक समाज में व्याप्त मनोविकृति को व्यक्त करने वाली एक सशक्त अभिव्यक्ति।
    वास्तव मे आधुनिकता का दंभ भरने वाली आज की पीढ़ी कुछ इसी तरह का शार्टकट रास्ता चुन रही है ।
    इस ओर इशारा करती एक बेहतरीन रचना के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। 🌹🌹🌹🌹🌸💐🥀🌹🌹🌹

  3. आज के समय की कड़वी सच्चाई, सुन्दर लघुकथा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here