काव्यभाषा : जिंदगी -गुरुदेव डहरिया,जांजगीर चाम्पा

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जिन्दगी

जिंदगी तू बता क्या ?
गुनाह था मेरा !
तुम हमसफर बन चली,
मैं सफर था तेरा!
सफर कुछ ऐसा था,
कि क्या कहें !
कुछ यादें थी,
कुछ मुलाकातें थी !
उन मुलाकातों कि
कुछ अनकही बातें थी!
जिंदगी तू बता क्या ?
गुनाह था मेरा!
तू हमसफर बन चली,
मैं सफर था तेरा!

जिंदगी की राहों में
मिले जब तुम थे!
क्या? कहूं कुछ
अध खिले उम्मीद थे!
जिंदगी को लोग
हमसफर समझ लिए !
जब साथ चले तो पता चला
वह बेवफा बन चले!
जिंदगी तू बता
क्या गुनाह था मेरा!
तू हमसफर बन चली
मैं सफर था तेरा।

जिंदगी जीने का,
तरीका सिखा! तेरे साथ-साथ बहू
ऐसा सलिका सीखा!
गमे जिंदगी के क्या?
पैगाम कहूं!
तू मजधार बन
और मुझे सरिता बना!
जिंदगी तू बता क्या?
गुनाह था मेरा।
तूम हमसफर बन चली,
मैं सफर था तेरा ।

जिंदगी तुम्हें क्या ?पता तू
किसी दौर से गुजरी थी।
थी तेरे साथ सारी खुशियां
गम मेरे साथ गुजरी थी।
जद्दोजहद सिद्धत पर थी,
पर मैं ना झुका था !
जीने के और भी तरीके थे,
पर मैं तुम्हें चुना था।
यूं तो कुछ खास
खफा नहीं जिंदगी तुझसे।
एक भरोसा था जिसे तूने
मेरे जीते जी तोड़ा था।
जिंदगी तू बता क्या?
गुनाह था मेरा।
तू हमसफर बन चली
मैं सफर था तेरा।
सफर था तेरा…… सफर था तेरा।

✍🏻✍🏻गुरुदेव डहरिया
धरदेई जांजगीर चाम्पा(छग)
मो.न.- 9981260234

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