काव्यभाषा : वरिष्ठ नागरिक दिवस -डॉ ब्रजभूषण मिश्र भोपाल

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वरिष्ठ नागरिक दिवस

दिन वरिष्ठ का मना रहे
कुछ जन भेजें संदेश
मैं सोचूँ मन ही मन में
है क्या कुछ आज विशेष

आंखों पर ऐनक है वही
चेहरे की रौनक भी वही
सिर पर नए बाल भी उगते न
फिर क्यों भेजा संदेश

पत्नी में कुछ परिवर्तन ना
उसके भाषण भी हैं कम ना
घर मे उसको क्यों दिखता मैं
इस ताने में भी कुछ कम ना

बच्चे भी बात नहीं करते
अब पहले से वे ना डरते
हुए वरिष्ठ हैं हम जब से
केवल मारे से हैं फिरते

ये दिन विशेष तो होगा तब
आदर,सत्कार करेंगे सब
जब बुड्ढा, कोई भी ना बोले
बोलेंगे विशिष्ट जन ही,सब

सरकार टैक्स जब ना लेवें
हमको विशिष्ट भत्ता देवें
अजीवन हमने सेवा की
उसका प्रतिदान हमें देवें

पत्नी जब पहले सी रूठे
आरोप मढ़े झूठे झूठे
खुद में चिर यौवन मैं पाऊं
फिर पहले जैसा मैं हो जाऊं

हे भगवन मुझको ऐसा कर दो
कुछ तो विशिष्ट मुझको वर दो
जन वरिष्ठ का बोध डराता है
और जीने को मन ललचाता है

फिर यूँ भी सोचा करता हूँ
नाहक मरने से डरता हूँ
भगवन ने मनुष्य जीवन दिया।
ब्रज क्या आशीष मुझे ये कम दिया

डॉ ब्रजभूषण मिश्र
भोपाल

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