काव्यभाषा : मोरे आँगना -डॉ.अखिलेश्वर तिवारी पटना

Email

मोरे आँगना

मोरे अँगना हो मोरे अँगना हो मोरे अँगना।
कैसे आएगा चाँद मोरे अँगना।
देखो कैसे तड़पताहै तेरे बिना तेरा सजना।
कैसे आएगा चाँद मोरे आँगना।

दूर से देखूँ तुझे तो मनवाँ मोर तरसे।
तेरे बिना मोर नैना सावन सा बरसे।
कैसे बिताऊँ मैं अब जालिम रैना।
कैसे आएगा चाँद मोरे आँगना।

विस्तर पर जब जाऊँ तो नींद नहीं आए।
विस्तर पर सलवतों की संख्या बढ़ जाए।
ख्वाबों मेंभी गूँजे आवाज जैसे तेरा कँगना।
कैसे आएगा चाँद मोरे आँगना।

कभी तेरा दीदार मेंहदी के साथ हो जाए।
मेरे अंदर के शरर को तुम और भड़काए।
मेरा जौला को चाहा है किस रँग में रंगना।
कैसे आएगा चाँद मोरे आँगना।

कशिश तेरी ऐसी की कैफियत बिगड़ जाए।
तुझे देखकर मन परवाज भरने लग जाये।
कब लगेंगे कफ़स मेरी चाह को है देखना।
कैसे आएगा चाँद मोरे आँगना।

डॉ.अखिलेश्वर तिवारी
पटना

शरर-चिंगारी,जौला-मन के भीतर की आग,
कशिश-आकर्षण,कैफियत-अवस्था, परवाज –
उड़ान,कफ़स-पिंजड़ा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here