काव्यभाषा:तीज मनाने जब तुम आना-नीलम द्विवेदी रायपुर छत्तीसगढ़

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तीज मनाने जब तुम आना

अब के सावन में साजन, झूला फिर मेरे लिए सजाना,
सज धज के जब मैं झूलूँगी,नजरें मुझ पर से नहीं हटाना,

सरहद से छुट्टी लेकर, संग तीज मनाने जब तुम आना,
एक नई पायल की जोड़ी और हरी चूड़ियाँ लेते आना,

शिव पार्वती के पुनर्मिलन वाला दिन,मेरे संग बिता जाना,
मैं सोलह श्रृंगार करूँगी, तुम गजरे से केश सजा जाना,

सातों जन्म तुम्हें ही पाऊँ , व्रत मेरा पार लगा जाना।
सावन की बौछारें भी, तुम बिन जब मुझे भिगाती हैं,

आँखें भी मेरी बरस बरस कर प्रियवर तुम्हें बुलाती हैं,
मुझको धानी चुनर ओढ़ा कर संग मेरे भीग तुम जाना,

सरहद से छुट्टी लेकर, संग तीज मनाने जब तुम आना,
एक नई पायल की जोड़ी और हरी चूड़ियाँ लेते आना,

और अगर देश की खातिर मेरे प्रिय तुम न आ पाओ,
हरी भरी वादियों को ही तुम मेरी बाँह समझ लेना,

इस मिट्टी और पवन की खुशबू को तुम गले लगा लेना,
तीजा के दिन जब सखियाँ, गीत मधुर मिलन के गायेंगी,

सौभाग्य देश का रहे अखंड, मैं यही मंत्र दोहराऊंगी,
गौरी ने भी तो कठिन तपस्या करके ही शिव को जाना,

मैं भी पार्वती सा धैर्य धरूँगी और तुम विषधर बन जाना।
सरहद से छुट्टी लेकर, संग तीज मनाने जब तुम आना।।

नीलम द्विवेदी
रायपुर छत्तीसगढ़

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