काव्यभाषा : जीने की चाह – कुन्ना चौधरी,जयपुर

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जीने की चाह

क्या थी वो मजबूरी जो न टूटी कभी उसकी जीने की चाह,
कीट पतंगे की तरह बेमानी ज़िन्दगी में भी रही जीने की चाह ……

मासूम सी कचड़े के ढेर में मिली थी वो चीथड़ों से लिपटी ,
देर रात एक नर्स ने सुना वो क्रंदन जिसमें थी जीने की चाह ……

जैसे तैसे बच गई पर न पढ़ाई न परवरिश सड़कों में हाथ फैलाना बना नसीब ,
कभी पिटी कभी लूटी पर न छूटी ये बेमानी जीने की चाह ….

किस लिये जन्म होता है इन जैसे लोगों का संसार में कौन बताये ,
हर दु:ख दर्द सह कर भी कैसे बनी रहती है इनकी जीने की चाह …..

मान सम्मान पैसा शोहरत हासिल करके भी कई मान लेते है हार जीवन से ,
नर्क सी ज़िन्दगी भोग कर भी क्यों नहीं ख़त्म होती ये जीने की चाह ……..

मान कर अपना प्रारब्ध या परमात्मा की इच्छा शायद ,
गिरते पड़ते मर मर कर भी बनाये रखते है ये जीने की चाह …….

रोज़ नज़र आते हैं कितने ही समाज में ऐसी बेबस ज़िन्दगियाँ,
और कुछ नहीं तो उनसे सीख सकते हैं अमोघ जीने की चाह ……

कुन्ना चौधरी
जयपुर

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