काव्यभाषा : ग़ज़ल -राहुल वासुलकर नागपुर

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ग़ज़ल

झील किनारे वाली बस्ती है इन आँखों में ।
जिंदगी महंगी सांसे सस्ती है इन आँखों में ।

फितरत ने आज फिर आजमाया है मुझे
वही खड़ी पुरानी हस्ती है इन आँखों में ।

बरसों पहले दिए घाव और कुछ निशानियां ,
यादों की तपिश दुरुस्ती है इन आँखों में ।

जुस्तजू मिटा ना सके चाहतों के ये पैमाने ,
कैद गुलिस्तां जैसी सुस्ती है इन आँखों में ।

यादों की धूल पट गई चारों और दीवारों पर
बेतकल्लुफ थोड़ी सरपरस्ती है इन आँखों में ।

ये कलम क्या ही लिखे अल्फाज़ो से दर्द मेरा ,
दिल और दिमाग की कुस्ती है इन आँखों में ।

पढ़ न सके मुझे तुम कभी तो बोल ही उठूंगा ,
निभाई क्या ही खाक दोस्ती है इन आँखों में ।

राहुल वासुलकर
नागपुर

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