काव्यभाषा : अविरल धारा -नीलम द्विवेदी रायपुर छत्तीसगढ़

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अविरल धारा

बहुत रातों से जाग रहे हैं,
उर में भर के जैसे ज्वाला।
बहुत पिरोया है धड़कन ने,
दर्द भरे गीतों की माला,
तेज ताप से हिमशिखरों की,
पिघल रही कोई शाखा,
प्रबल वेग से निकल पड़ी है,
संयम का टूटा हर ताला,
आँखों से अनवरत बहे हैं,
अश्रु की अविरल धारा,
अंतरमन के करुण भाव,
मेरे अपनों तक पहुँचाये,
कैसे मेरे नयनों से बहकर,
पहुँचे उन तक अविरल धारा,
मन से मन को मिलवाती है,
जब बने स्नेह अविरल धारा।
कैसे आँखों ही आँखों में,
हर भेद कहे अविरल धारा,
मन पे ठहरे हर बोझ घटा दे,
निश्छल बहती अविरल धारा,
इंद्रधनुष सा गढ़ देती है,
निर्झर बनती अविरल धारा।
रोक लो तुम अंचल में अपने,
किस मार्ग चली अविरल धारा,
वो मीठी पावन गँगा जल सी,
और समुंदर है कितना खरा।

नीलम द्विवेदी
रायपुर छत्तीसगढ़

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