“बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा” अनुभव का आकलन – डॉ. वर्षा सिंह

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बुधवारीय स्तम्भ : विचार वर्षा
अनुभव का आकलन
– डॉ. वर्षा सिंह

अक्सर हम यह कहते, सुनते हैं कि फलां अनुभवी है, फलां वहीं है अनुभवहीन है। तो यह अनुभव क्या है ? प्रत्यक्षज्ञान को ही अनुभव कहते हैं और अनुभव वह जानकारी है जो किसी कार्य को करने पर हमारे मस्तिष्क में स्वयंमेव एकत्रित हो जाती है और जब हम पुनः वही कार्य करते हैं तो वह अनुभव उस को करते समय हमारा मार्गदर्शन करती है। अच्छे कार्यों के अनुभव जीवन की प्रगति एवं समाजोत्थान का कार्य करते हैं जबकि बुरे कार्यों के अनुभव हमें बुराई तथा बुरे व्यक्तियों से बचाने का कार्य करते हैं । जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान हम अपने अनुभव के आधार पर ही प्राप्त कर पाते हैं। यह अनुभव हमारे अपने हों या दूसरों के हमेशा हमें शिक्षित करने का कार्य करते हैं। अब यह और बात है कि हम अपने अथवा पराए अनुभवों से कितनी शिक्षा ग्रहण कर पाते हैं।
ज़रूरी है अनुभव का आकलन किया जाना। हम जानते हैं कि जब एक नन्हा बच्चा आग को छूने की चेष्टा करता है तो उसका हाथ जल जाता है और वह इस प्रत्यक्ष ज्ञान से यह अनुभव प्राप्त कर लेता है कि आग को छूना गलत है इसे छूने से हाथ जल जाता है वह आग से डरने लगता है । अब यह जरूरी है कि वह अपने इस अनुभव का आकलन करें कि यह आग उसे कितनी दूरी से नुकसान पहुंचा सकती है अथवा उसे आग से कितनी दूर रहना चाहिए कि वह उसे जला न सके उसे हानि न पहुंचा सके। नन्हें बच्चे में इस तरह के आकलन की क्षमता नहीं होती, यह क्षमता धीरे-धीरे विकसित होती है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है वह अपने अनुभव से जानने लगता है कि उसे किस चीज़ से दूरी बना कर रखना चाहिए और किस चीज के करीब जाना चाहिए, कौन-सी वस्तु अथवा कौन-सा कार्य उसे हानि पहुंचा सकता है या कौन सा कार्य उसके लिए उपयोगी हो सकता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है वैसे वैसे अनुभवों का दायरा भी पढ़ता जाता है और उन अनुभवों के प्रति आकलन क्षमता का भी विकास होता जाता है।
एक तरह से देखा जाए तो जीवन की वास्तविक समझ अनुभव से पैदा होती है। हम अपनी क्षमताओं का समुचित आकलन और नियोजन अनुभव द्वारा ही कर सकते हैं। अनुभव के बिना न तो हम अपना जीवन सुगमतापूर्वक जी सकते हैं और न ही अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। हमारी क्षमताएं हमारे भीतर सुप्त रूप में पड़ी रहती हैं। इन्हें तभी जाग्रत कर निर्दिष्ट कार्य में नियोजित किया जा सकता है, जब हम अपने अनुभवों का सही- सही आकलन करें।
इस संदर्भ में मैं यहां चर्चा करना चाहूंगी घाघ और भड्डरी की, जिनकी कहावतें उनके स्वयं के अनुभवों के सही आकलन का निचोड़ हैं। उन्होंने अपने प्रत्यक्षज्ञान से जो अनुभव अर्जित किए उनका सही आकलन करने में वे एक तरह के विशेषज्ञ साबित हुए। आज भी घाघ और भड्डरी के अनुभवों के सही आकलन से उपजी कहावतों के आधार पर ग्राम्य-अंचल में खेती एवं सामाजिक समस्याओं का निदान किया जाता है।
घाघ तथा भड्डरी द्वारा लगभग 400 वर्षों पूर्व दिया गया वैयक्तिक अनुभव के सही आकलनजन्य यह मौसम ज्ञान तथा शुभाशुभ विचार आज भी प्रासंगिक है।
घाघ में बचपन से ही अनुभवों का सही आकलन करने की क्षमता विकसित हो गई थी। वे कृषि विषयक समस्याओं के निदान में अत्यंत दक्ष थे और दूर-दूर से लोग उनके पास अनेक समस्याओं के समाधान के लिए आया करते थे। घाघ के संबंध में यह कथा बहुत प्रचलित है कि एक बार बचपन में घाघ अपने हमउम्र बच्चों के साथ खेल रहे थे। तब घाघ की विकसित आकलन क्षमताओं के बारे में सुन कर एक ऐसा व्यक्ति उनके पास आया जिसके पास कृषि कार्य के‍ लिए पर्याप्त भूमि थी, किंतु उपज उसमें इतनी कम होती थी कि उसका परिवार भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर रहता था। उस व्यक्ति की समस्या सुनकर घाघ तुरंत बोल उठे-
आधा खेत बटैया देके, ऊंची दीह किआरी।
जो तोर लइका भूखे मरिहें, घघवे दीह गारी।।

अर्थात् तुम अपने आधे खेत को अपने पड़ोसी को बटिया पर दे दो और अपने पास वाले हिस्से की मेंढ़ ऊंची करवा लो फिर भी यदि तुम्हारे बच्चे भूख से व्याकुल हों तो तुम मुझ घाघ को जितनी चाहो उतनी गालियां देना।
दरअसल घाघ समझ गए थे कि उस व्यक्ति की पड़ोस में रहने वाला व्यक्ति ही उनके खेत से उनकी बोली हुई फसल में से चोरी कर लेता है जिसके कारण उस व्यक्ति के बच्चों को अच्छी उपज होने के बावजूद भूखे मरने की नौबत आ जाती है और इसीलिए घाघ ने उस व्यक्ति को यह सलाह दी कि वह अपना आधा खेत पड़ोसी को बटिया में दे दे और अपने हिस्से वाले खेत की मेड ऊंची करवा ले उनकी यह सलाह उनके अपने अनुभवों के आकलन से उपजी थी और इसीलिए वह सलाह कारगर सिद्ध हुई।
इसी तरह घाघ की यह कहावत भी उनके अपने अनुभवों के सही आकलन से जन्मी है-
चैते गुड़ बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही।।
अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय, वहि घर बैद कबौं न जाय।।

अर्थात् घाघ कहते हैं, चैत्र मास में गुड़, वैशाख में तेल, जेष्ठ मास में यात्रा, आषाढ़ में बेल, श्रावण में हरे साग, भाद्रपद में दही, क्वांर अथवा अश्विन में करेला, कार्तिक में मट्ठा, अग्रहायण अथवा मार्गशीर्ष मास में जीरा, पौष में धनियां, माघ में मिश्री, फागुन में चने खाना हानिप्रद होता है। यदि उपरोक्तानुसार इन वस्तुओं का सेवन करने से जो व्यक्ति बच कर रहेगा तो उसे वैद्य की कभी आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

पहिले जागै पहिले सौवे, जो वह सोचे वही होवै।
अर्थात् घाघ कहते हैं कि रात्रि में जल्दी सोने और प्रातःकाल जल्दी उठने से बुध्दि तीव्र होती है। अर्थात् विचार शक्ति बढ़ जाती हैै।

प्रातःकाल खटिया से उठि के पिये तुरन्ते पानी।
वाके घर मा वैद ना आवे बात घाघ के जानी।।

अर्थात् घाघ कहते हैं कि यदि प्रातः काल बिस्तर से उठते ही पानी पिया जाए तो व्यक्ति का स्वास्थ्य ठीक रहता है और उसे डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
घाघ की मौसम संबंधी ये कहावतें भी बहुप्रचलित हैं। ये कहावतें कृषि कार्यों में मार्गदर्शक का कार्य करती हैं –
उत्तर चमकै बीजली, पूरब बहै जु बाव।
घाघ कहै सुनु घाघिनी, बरधा भीतर लाव।।

अर्थात् यदि उत्तर दिशा में बिजली चमकती हो और पुरवा हवा बह रही हो तो घाघ अपनी स्त्री से कहते हैं कि बैलों को घर के अंदर बांध लो, वर्षा शीघ्र होने वाली है।

सावन केरे प्रथम दिन, उवत न ‍दीखै भान।
चार महीना बरसै पानी, याको है परमान।।

अर्थात् यदि सावन के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा को आसमान में बादल छाए रहें और प्रात:काल सूर्य के दर्शन न हों तो निश्चय ही 4 महीने तक जोरदार वर्षा होगी।

आदि न बरसे अद्रा, हस्त न बरसे निदान।
कहै घाघ सुनु घाघिनी, भये किसान-पिसान।।

अर्थात् आर्द्रा नक्षत्र के आरंभ और हस्त नक्षत्र के अंत में वर्षा न हुई तो घाघ कवि अपनी स्त्री को संबोधित करते हुए कहते हैं कि ऐसी दशा में किसान पिस जाता है अर्थात बर्बाद हो जाता है।
चमके पच्छिम उत्तर कोर। तब जान्यो पानी है जो।।
अर्थात् जब पश्चिम और उत्तर के कोने पर बिजली चमके, तब समझ लेना चाहिए कि वर्षा तेज होने वाली है।

चैत मास दसमी खड़ा, जो कहुं कोरा जाइ।
चौमासे भर बादला, भली भां‍ति बरसाइ।।

अर्थात् चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को यदि आसमान में बादल नहीं है तो यह मान लेना चाहिए कि इस वर्ष चौमासे में बरसात अच्छी होगी।

जब बरखा चित्रा में होय। सगरी खेती जावै खोय।।
अर्थात् यदि चित्रा नक्षत्र में वर्षा होती है तो संपूर्ण खेती नष्ट हो जाती है। इसलिए कहा जाता है कि चित्रा नक्षत्र की वर्षा ठीक नहीं होती।

उलटे गिरगिट ऊंचे चढ़ै। बरखा होई भूइं जल बुड़ै।।
अर्थात् यदि गिरगिट उलटा पेड़ पर चढ़े तो वर्षा इतनी अधिक होगी कि धरती पर जल ही जल दिखेगा।

करिया बादर जीउ डरवावै। भूरा बादर नाचत मयूर पानी लावै।।
अर्थात् आसमान में यदि घनघोर काले बादल छाए हैं तो तेज वर्षा का भय उत्पन्न होगा, लेकिन पानी बरसने के आसार नहीं होंगे। परंतु यदि बादल भूरे हैं व मोर थिरक उठे तो समझो पानी ‍निश्चित रूप से बरसेगा।

माघ में बादर लाल घिरै। तब जान्यो सांचो पथरा परै।।
अर्थात् यदि माघ के महीने में लाल रंग के बादल दिखाई पड़ें तो ओले अवश्य गिरेंगे। तात्पर्य यह है कि यदि माघ के महीने में आसमान में लाल रंग दिखाई दे तो ओले गिरने के लक्षण हैं।

रोहनी बरसे मृग तपे, कुछ दिन आर्द्रा जाय।
कहे घाघ सुनु घाघिनी, स्वान भात नहिं खाय।।

अर्थात् घाघ कहते हैं कि हे घाघिन! यदि रोहिणी नक्षत्र में पानी बरसे और मृगशिरा तपे और आर्द्रा के भी कुछ दिन बीत जाने पर वर्षा हो तो पैदावार इतनी अच्‍छी होगी कि कुत्ते भी भात खाते-खाते ऊब जाएंगे और भात नहीं खाएंगे।

घाघ की भांति भड्डरी भी अपने अनुभवों का सही आकलन कर अपनी दूरदृष्टि को विकसित कर पाए। भड्डरी की मौसम के अनुमान से संबंधित अनेक कहावतें आज भी हम इस प्रकार खरी उतरते हुए देखते हैं, मानों ये कहावतें मात्र नहीं, बल्कि कोई भविष्यवाणी हों।
यहां भड्डरी की कुछ कहावतें प्रस्तुत हैं।
अखै तीज रोहिनी न होई। पौष, अमावस मूल न जोई।।
राखी स्रवणो हीन विचारो। कातिक पूनों कृतिका टारो।।
महि-माहीं खल बलहिं प्रकासै। कहत भड्डरी सालि बिनासै।।

अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि वैशाख अक्षय तृतीया को यदि रोहिणी नक्षत्र न पड़े, पौष की अमावस्या को यदि मूल नक्षत्र न पड़े, सावन की पूर्णमासी को यदि श्रवण नक्षत्र न पड़े, कार्तिक की पूर्णमासी को यदि कृत्तिका नक्षत्र न पड़े तो समझ लेना चाहिए कि धरती पर दुष्टों का बल बढ़ेगा और धान की उपज नष्ट होगी।

शुक्रवार छाए बादरी, रहे शनीचर छाय ।
ऐसा बोले भड्डरी बिन बरसे न जाय ।।

अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि यदि शुक्रवार के दिन आसमान में बादल छाए रहे और शनिवार को भी बादलों के छाए रहने के कारण छाया बनी रहे रविवार को निश्चित रूप से वर्षा होगी।

पांच सनीचर पांच रवि, पांच मंगर जो होय।
छत्र टूट धरनी परै, अन्न महंगो होय।।

अर्थात् भड्डरी कहते हैं कि यदि एक महीने में 5 शनिवार, 5 रविवार और 5 मंगलवार पड़ें तो महा अशुभ होता है। यदि ऐसा होता है तो या तो राजा का नाश होगा या अन्न महंगा होगा।

सोम सुकर सुरगुरु दिवस, पूस अमावस होय।
घर-घर बजी बधाबड़ा, दु:खी न दीखै कोय।।

अर्थात पूस की अमावस्या को यदि सोमवार, बृहस्पतिवार या शुक्रवार पड़े तो शुभ होता है और हर जगह बधाई बजेगी तथा कोई भी आदमी दु:खी नहीं रहेगा।

आषाढ़ी पूनौ दिना, गाज बीज बरसंत ।
ऐसो बोले भड्डरी, आनंद मानो संत ।।

अर्थात् भड्डरी कहते हैं यदि आषाढ़ की पूर्णिमा को खूब बादल घिरें, गरज-चमके के साथ बारिश हो तो बरसात के चारों माहों में अच्छी बारिश होगी।

उतरे जेठ जो बोले दादूर।
कहै भड्डरी बरसे बादर।।

अर्थात् भड्डरी कहते हैं यदि ज्येष्ठ माह के अंतिम दिनों में मेंढक बोलते हैं, तो वर्षा अवश्य होती है।
यहां इस चर्चा का उद्देश्य यह है कि यदि हम भी अपने अनुभवों का सही आकलन करने की अपनी क्षमता को विकसित करें तो हम भी अनेक पूर्वानुमान लगा सकते हैं, अपने जीवन की अनेक समस्याओं का समाधान खोज सकते हैं और सिर्फ अपने ही नहीं बल्कि पूरे समाज के हित में कार्य कर समस्याग्रस्त लोगों को सही मार्गदर्शन दे सकते हैं।
….और अंत में मेरी यह काव्य पंक्तियां –

क्या ग़लत है क्या सही? पहचानना बेहद ज़रूरी।
अनुभवों के आकलन से सीखना बेहद ज़रूरी।
है ज़रूरी ज़िन्दगी बेहतर बनाना हर क़दम,
वक़्त की रफ्तार “वर्षा” जानना बेहद ज़रूरी।

सागर, मध्यप्रदेश

6 COMMENTS

  1. बेहतरीन लेख।
    एकदम सही है कि अनुभव ही व्यक्ति की असली पाठशाला होती है और अपने अनुभवों का आकलन कर के उन्हें समाज हित में साझा किया जा सकता है।

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