लघुकथा : गांधारी -दिव्या राकेश शर्मा गुरुग्राम, हरियाणा

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गांधारी

“क्या कर रहें हैं आप!वेआपकी बहन है।उसका हक कैसे छीन सकते हो आप?”
“तुम काम से काम रखो।बीच में बोलने की जरूरत नहीं है और शादी में इतना दान दहेज दिया बाबूजी ने और ऊपर से यह प्लॉट भी उसे ही दे रहे हैं।”

“हमें कमी किस चीज की है!दीदी की शादी में खर्चा किया तो क्या आपकी शादी में नहीं हुआ?आपको भी तो जमा जमाया कारोबार मिला।गाँव की जमीन यह बंगला ।किस बात की कमी है आपको?”

“मुझे आश्चर्य होता है देख कर कि कोई भाई इतना लालची कैसे हो सकता है!लेकिन मैं यह गलती नहीं करनें दूंगी।अगर आपको ऐसा करना ही है तो पहले श्रुति के नाम की जमीन वैभव के नाम कर दो ।जैसे दीदी को हक नहीं सम्पत्ति में वैसे ही आपकी बेटी को भी नहीं है।”

“दिमाग खराब हो गया है क्या?वो मेरी बेटी के लिए है मान लो शादी के बाद वैभव ने भाई होने की जिम्मेदारी न निभाई तो!हम कब तक रहेंगे।”
“जैसे आप निभा रहे हैं भाई की जिम्मेदारी बहन की जमीन हड़प कर वैसे ही वैभव निभा लेगा।”

पत्नी के मुँह से यह सुन वह खामोश हो गया जैसे किसी ने जोर का तमाचा उसके मुँह पर मार दिया हो।

“तुम सही कहती हो मुझे शर्म आ रही है अपनी सोच पर।आज ही दीदी को बता देता हूँ कि अपने रजिस्ट्री के कागज ले जाये।मुझे माफ करना तुम।गलती करनें से रोक दिया तुमने ,वरना महाभारत हो जाती।”
“नहीं होती क्योंकि मैं गांधारी नहीं हुँ।”

दिव्या राकेश शर्मा
गुरुग्राम, हरियाणा।

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