काव्यभाषा : इतना ना सताओ – शैलेन्द्र,अम्बेडकर नगर उत्तर प्रदेश

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इतना ना सताओ

किसी को इतना ना सताओ कि वो रो दे
तैस में आके कपड़े की तरह ना धो दे!
गुमान किस बात का करता है खाता वही रोटी
तु गरीब मजबूर की क्यों नोचता है बोटी।
ऐसा ना हो कि इंसानियत को तुम खो दो!
उसके घर में खाने को एक निवाला नहीं।
है वह बुद्धिजीवी कोई यह तो दीवाला नहीं
मारो ना इतना हक कहीं वो अपनों को खो दे!
इंसान होकर इंसानियत को समझो यारो
शैतान नियत हैवानियत को ना अपनओ यारों
कहीं मजबूर होकर अपनी जान ना खो दे!!

~ शैलेन्द्र
बढ़ियानी खुर्द, बसखारी
अम्बेडकर नगर उत्तर प्रदेश

1 COMMENT

  1. आदरणीय संपादक जी आभार आपका बहुत बहुत धन्यवाद जी

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