लघु आलेख – रिश्ते-भावना भट्ट भावनगर,गुजरात

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लघु आलेख
रिश्ते

रिश्तों में दरार अब आम बात हो चुकी है। कभी सतह तक आकर सब के सामने खुल जाती है वो दरारें। या कभी गहराई में जाकर विस्तृत होती रहती है ये दरारें।

अक्सर दरारों की जड़ो को देखें तो मिलती है चुप्पियां। चुप्पियां अगर यौगिक हो तो अच्छा है कि सामने वाले को मौन से थामकर उस के उलझे मन को सुलझने का वक़्त दिया जा रहा है।

मगर मैंने अक्सर देखा है। चुप्पी की वजह केवल नाराज़गी या फिर अहंकार होता है। सामने वाले के शब्द को वो कभी सुनने को तैयार ही नहीं है।

हो सकता है की शब्दों के पीछे की भावनाएं अलग हो..!या फिर बोलने वाले का मन कोई बात से जख़्मी हुआ हो। जो भी हो मगर अक्सर एक व्यक्ति के शब्द दूसरे के चट्टान जैसे मौन से टकराकर बिखर जाते है। संभावना ये भी नाकारी नहीं जा सकती की वो शब्द एक दिन खुद ही अपना दम तोड़ दें। बोलने वाला भी खामोश हो जाय हमेशा के लिए। तब बीच की दीवार अपनी मजबूती पर हँसती हुई दो व्यक्तियों के बीच के नाज़ुक संबंधों का अंत देखती रहती है।

मेरा मानना है की अगर रिश्तों को टूटने से बचाना हो तो संवाद एक सशक्त माध्यम है। उन दोनों के बीच कोई तीसरी व्यक्ति या उनकी सलाह भी नहीं केवल दो और समय।

मैंने अक्सर देखा है बात में कुछ दम नहीं होता और दोनों ओर से खींचती रहती है रिश्तों की नाजुक डोर।

कभी कभी विघ्नसंतोषी लोग जो शुभ चिंतकों के भेष में आकर उन दोनों के बीच हुई दरार को हवा देकर बड़ी कर के दूर जाकर तालिया बजाते भी देखें है।

क्यूँ न हम सजगता से अपने रिश्तों को देखें?तनिक शांत होकर सोचे कि क्या हम कुछ शब्दों को या कुछ गलतियों को अहमियत देना चाहते है या जो हम से विश्वास की डोर से बंधकर इतने कदम हमारें साथ चले उन को अहमियत देंगें?

कोई भी उलझन हो, हमेशा से सुलझाई जा सकती है मगर शर्त एक ही है। उलझे हुए दो व्यक्ति, समय और संवाद..

भावना भट्ट
भावनगर,गुजरात

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