काव्यभाषा : वीर सपूत -चन्द्रकान्त खुंटे लोहर्सी जांजगीर चाम्पा(छग)

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वीर सपूत

ऐ धरा के वीर सपूत
तेरे कंधो पर है धरती का भार।
मिट्टी कर रही पुकार
जा हिमालय पर दहाड़।
सिंह का पहन लें बाना
और गरज बार-बार।
कांटो की सीमा हो या फूलो की बहार।
अपने अंतरंग में जगा शोलो की अंगार।

जब भी छिड़े द्वंद्वयुद्ध
तू हो जा सिंह सा क्रुद्ध
झपट दुश्मनो पर
मार के छलांग
बस हो दो फलांग
फाड़ दे सीना,कर दे छल्ली-छल्ली
दो चार नही,हो चाहे सत्तर-अस्सी।
देश-धरा की खातिर
हो जाओ बलिदान।

पांव टूटे या हो सूजन
गगन-धरा में भर गर्जन।
भीड़ हो जाये निर्जन
दुर्जन का कर विसर्जन।
बीस के बदले अस्सी मारकर
ले इंतकाम।
पहुँचना है शीर्ष मुकाम
नही करना चैन-आराम
सैन्यदल को सलाम।

जो भी हो तेरे खिलाफ
न करना उसको माफ़।
शीघ्र बढ़ाओ अपने ग्राफ
तभी होगा इंसाफ।
पड़ोसियों से हो जंग
बन जा तू भुजंग।
डस ले सभी को
नीचे हो चाहे पलंग।
अंतरंग में रख उमंग
लहरो सा जगा तरंग।
कर लो प्रण वतन से
रखना है उसकी शान।
प्राण रहे चाहे जाये जान।
भारतमाता की आन,
नही झुकने देना है सम्मान।

✍️✍️चन्द्रकान्त खुंटे
लोहर्सी जांजगीर चाम्पा(छग
)

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