काव्यभाषा : भारत की यह भू है प्यारी -नीरजा’नीरू’ ,लखनऊ

भारत की यह भू है प्यारी

भारत की यह भू है प्यारी
आकर्षित जग को करती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

मस्तक पे रख ताज तुहिन का
पग को अर्णव से धोती
हाथों में रखती शशि रवि को
हिय में बहु संस्कृति मोती
वस्त्रों में टाँके नग कानन
माला नदियों की पहने
ताल पोखरे निर्झर प्यारे
रज माणिक इसके गहने

विविध रंग की चूनर इसकी
सकल विश्व का मन हरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

आक्रान्ता जब जब जो आए
ढेरों कत्ले आम किए
लूटे इसकी धन दौलत को
भय का ही पैगाम दिए
डरी नहीं यह डटी रही यह
गिर गिर फिर फिर खड़ी हुई
दिन में तारे दिखा त्रास को
संतति इसकी बड़ी हुई

बसे यहाँ फिर आ उन्मादी
भायी उनको ये धरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

बिहू कुचिपुड़ी झूमर कजरी
छाऊ भंगड़ा नृत्य बड़े
कथक कथकली रौफ ओडिसी
खुद को सुंदर कहें खड़े
विविध प्रान्त के नृत्य अनोखे
जनमानस का मन हरते
बने प्रांत के प्रतिनिधि सारे
सबके मन में घर करते

सबका स्वागत करे धरा यह
सबको अंक सदा भरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे मठ
गिरजाघर भी बने यहाँ
विविध भाँति के पंथ यहाँ पर
कभी किसी से लड़ें कहाँ
निर्गुण और सगुण धाराएँ
संग संग ही यहाँ बहें
एक म्यान में दो तलवारें
केवल जग में यहाँ रहें

शूरों वीरों की जननी ये
दुनिया इससे है डरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

दक्षिण भारत के व्यंजन हों
या हो पश्चिम की थाली
हो पूरब का रसगुल्ला या
उत्तर की कहवा प्याली
त्यौहारों पर धूम मचाते
भाँति भाँति के व्यंजन ये
प्रेम और सौहार्द बाँटते
जाति धर्म तज बंधन ये

हो दुश्मन भी यदि दर पर तो
अतिथि भावना ही वरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

इसी धरा पर जन्म सदा हो
यही मिले आँगन प्यारा
खाकर इसका अन्न हमेशा
गाऊँ गुण जग में न्यारा
पावन सी यह धरा सुहानी
नहीं मिले ऐसी जग में
धर लूँ माथे रज मैं इसकी
जब भी उलझन हो मग में

करती वंदन देह सदा यह
और श्वांस इस पर मरती
युग युग से अपने आँचल से
हीरे पन्ने ही झरती

_नीरजा’नीरू’
लखनऊ

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