काव्यभाषा : आजादी – कुन्ना चौधरी जयपुर राजस्थान

आज़ादी

सात दशक आज़ादी के और फिर भी हम हैं परेशान ,
क्या चाहा था हमने और क्या पाया होकर के आज़ाद,

ज़ुल्म से मुग़लों और अंग्रेज़ों की हमने की थी बग़ावत ,
आज जाति धर्म के नाम पर हो रहे आतंक से हम कैसे हों आज़ाद …..

करके सर्वोच्च बलिदान वीरों ने दिलाई हमें स्वतंत्रता बरसों पहले,
पाश्चात्य शैली के अनुसरण के बंधन से पर आज कैसे हों आज़ाद …

बहुत तरक़्क़ी की है हमने शिक्षण के क्षेत्र में ,पर विदेश जा रहा हुनर ,
अलगाववाद और आरक्षण की इस कूट नीति से हम कैसे हों आज़ाद ….

दिनरात बढ़ रहा हमारा आर्थिक स्तर दुनिया के मानचित्र पर ,
भ्रष्टाचार से फैली अमीरी ग़रीबी की विषमता से हम कैसे हों आज़ाद …

स्वास्थ्य,चिकित्सा और विज्ञान में हुआ है नाम रोशन हमारा पर ,
भ्रूण हत्या और बलात्कार की मानसिकता से पर कैसे हों आज़ाद….

हरित क्रांति ने भूखे देश को भर दिया था अनाज के भंडारों से पर,
हमारे अन्नदाताओं की आत्महत्या के क़र्ज़ से हम कैसे हों आज़ाद …..

तकनीकी तरक़्क़ी के ज़रिये सारी दुनिया को कर ली मुट्ठी में हैं पर ,
कचरा फैलाने ,दूषित पर्यावरण और मादक नशे की लत से कैसे हों आज़ाद …

ये आज़ादी देशभक्तों की भेंट हैं हमें ,अब ये हैं हमारा फ़र्ज़ कि हम रचे,
सुनहरा सर्वगुण सम्पन्न देश जो सब कहें ये हुए है सही मायने में आज़ाद ….

कुन्ना चौधरी
जयपुर राजस्थान

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