‘सबक-ज़िन्दगी के’ : मानवीय रिश्तें कभी परफेक्ट नहीं होते… – डॉ.सुजाता मिश्र सागर

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सबक-ज़िन्दगी के
मानवीय रिश्तें कभी परफेक्ट नहीं होते….

आज मैं बात करने जा रही हूं जीवन के ऐसे सत्य पर जिससे हम सभी कभी न कभी रूबरू होते हैं।मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, लोगों से मिलना -जुलना,उनसे लगाव हो जाना, जुड़ जाना यह मनुष्य का स्वभाव है। मनुष्य का स्वभाव यह भी है कि वह जब भी किसी व्यक्ति से मन से जुड़ता है तो यही मानकर चलता है कि फलां व्यक्ति दुनिया का सबसे अच्छा,सर्वगुण संपन्न व्यक्ति है,और इसके साथ से हमारा जीवन और बेहतर हो जाएगा। दोस्ती हो, प्रेम हो,वैवाहिक सम्बंध हो यहाँ तक कि निजी पारिवारिक रिश्तों में भी व्यक्ति यही मानकर चलता है। इस क्रम में प्रत्येक व्यक्ति “परफेक्ट रिश्ते” की अपनी एक परिभाषा भी गढ़ लेता है।उसे लगता है कि दुनिया के सर्वश्रेष्ठ माता -पिता उसके पास हैं, सर्वश्रेष्ठ जीवनसाथी उसका है, सबसे अच्छा परिवार उसका है,सबसे पक्के दोस्त उसके हैं। उसकी यह भावनाएं तभी तक सामान्य रहती है जब तक स्थितियां उसके अनुकूल चलती रहती हैं। अब यदि इस क्रम में यदि बच्चे को पता चले कि उसके माता – पिता में अलगाव हो गया है, और माता – पिता में से कोई एक किसी अन्य के साथ जुड़ गया है तो वह बच्चा जीवन के इस सत्य को स्वीकार नहीं पाता। क्योंकि उसकी नज़र में उसका परिवार सर्वश्रेष्ठ था,तो ऐसा कैसे हो सकता है! ऐसा ही अन्य रिश्तों में एकाएक आये बदलाव के कारण देखने को मिलता है। यानि रिश्तों की बनी – बना परिपाटी में जरा सा भी परिवर्तन व्यक्ति स्वीकार नहीं पाता।अपनों से धोखा खाये हुए लोग परायों में अपनापन तलाश्तें है, फिर किसी दिन उनके भी किसी व्यवहार से आहत हो उनसे दूर हो जाते हैं। क्योंकि हर व्यक्ति कहीं न कहीं किसी एक परफेक्ट रिश्तें की तलाश में रहता है, कि दुनिया की भीड़ में कोई एक तो होगा जो उसे पूरी तरह समझेगा, और बिना स्वार्थ,बिना छल -प्रपंच,बिना भेदभाव के आजीवन साथ निभाएगा। लेकिन यह सोचना ही अतार्किक है। निश्चित तौर पर आजीवन साथ निभाने वाले मित्र, रिश्तेदार और परिजन तो आपको मिल ही जाएंगे, किन्तु वो सभी आपकी बनाई हुई “परफेक्शन’’की परिभाषा में सदा फिट होंगे यह असम्भव है।ऐसी उम्मीद आपकों एक रिश्तें से दूसरे रिश्तें,दूसरे से तीसरे रिश्तें तक दौड़ाती रहेगी, और हो सकता है कि एक दिन रिश्तों से पूरी तरह आपका यकीन ही उठ जाए। इसलिए रिश्तों में परफेक्शन तलाशना बंद कीजिए,और याद रखिये लोग अच्छे या बुरे नहीं होते , उनकी परिस्थितियां और समय उन्हें अच्छा या बुरा बना देते हैं,इसलिए हर व्यक्ति किसी की नज़र में बहुत अच्छा होता है तो किसी न किसी की नज़र में बहुत बुरा भी होता ही है। अतः जीवन और रिश्तों की परिवर्तनशीलता को स्वीकारना सीखिए। यही आपके मानसिक और आत्मिक विकास का एकमात्र जरिया है।

डॉ.सुजाता मिश्र
सागर

2 COMMENTS

  1. बहुत बढ़िया लेख, प्रिय आ .सुजाता जी को बहुत बधाई।

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