काव्यभाषा : आजादी की कीमत -सुखविंद्र सिंह मनसीरत खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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आजादी की कीमत

आजादी की क्या होती कीमत तुम क्या जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

रक्तकुण्ड में कितनो ने अमूल्य रक्त बहाया था
आजादी के परवानों ने जीवन दाव लगाया था
घर अन्दर दुबके बैठे ,तुम क्या कीमत जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

शमशीरों ने धूल चटाई गोरों की सरकारों को
जड़ से ही उखाड़ फैंका फिरंगी सरकारों को
भीरू प्रवृति वाले हो ,तुम क्या कीमत जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

शूरवीरों की शूरता से अमूल्य आजादी पाई है
माताओं के वीर जवानों ने निज जाने गंवाई है
भेंट में मिली आजादी,तुम क्या कीमत जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

खून से पाई आजादी जिसका कोई मोल नहीं
कण कण में सोया शहीद,शहीदी का तोल नहीं
खून खौलता नहीं तुम्हारा, क्या कीमत जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

रणबांकुरों ने रणभूमि में पीठ नहीं दिखाई थी
पराक्रम की गर्जना सुनके चंडी भी घबराई थी
तन मन से है हारे बैठे,तुम क्या कीमत जानो रे
पिंजरे अन्दर कैद परिंदा ही कीमत पहचाने रे

सुखविंद्र वंदन कर श्रद्धांजलि अर्पित करता है
देश की जान झौंक दी,सुमन समर्पित करता है
अनुसरण अनुकरण कला से तुम कीमत जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

आजादी की क्या होती कीमत तुम क्या जाने रे
पिंजरे अन्दर कैद परिन्दा ही कीमत पहचाने रे

सुखविंद्र सिंह मनसीरत
खेड़ी राओ वाली (कैथल)

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