काव्यभाषा : मेरे वतन की मिट्टी-नीलम द्विवेदी रायपुर( छत्तीसगढ़)

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मेरे वतन की मिट्टी

तेरे लिये सब कुछ सह लेंगे मेरे वतन की मिट्टी,
तन ,मन धन सब तुझपे अर्पण है देश की धरती,
देकर लहू सिंचा है जिसको वीर जवानों ने,
उस धरती को हम अपने सर माथ रखेंगे,
बुद्ध, नानक, साईं, कृष्ण, राम की धरती,
सीता, राधा, मीरा की कर्मस्थलि ये धरती,
आज़ाद, प्रताप और लक्ष्मी बाई से सजी ये धरती
ऐसे कितने ही वीरों की माता ये धरती,
कारगिल में लड़ते,गिरते,कटते वीरों की,
गाती है अमर शहीदों की गाथा ये धरती,
कितनी माताओं ने दूध चढ़ाया अपना,
कितनी बहनों ने राखी अर्पण कर दी,
कितनी दुल्हनों ने माटी से श्रृंगार किया,
अपना सिंदूर वतन के ऊपर वार दिया,
कितने बचपन तरसे पिता की गोदी को,
इन सब का कर्ज चुकाना है हम सबको,
अपने भारत को फिर स्वर्ग बनाना है हमको,
प्रेम और भाईचारे का फूल खिलाकर,
खुशबू से फिर से भर दें माता के आँचल को,
जाति- पाति और बड़े छोटे का भेद मिटा दें,
मानवता का धर्म चलो हम सब अपना लें,
बाहर से आते दुश्मन से कुछ भाई लड़ते हैं,
कदम नही इस पावन धरा में रखने देते हैं,
अंदर के दुश्मन से अब तो लड़ना है हमको,
आज चलो मिलकर के हम ये सौगंध उठाएँ,
प्राणों से भी बढ़कर है आज वतन की मिट्टी,
तन ,मन धन सब तुझपे अर्पण है देश की धरती।

नीलम द्विवेदी
रायपुर( छत्तीसगढ़)

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