काव्यभाषा : रिमझिम बूँदें -डॉ.अवधेश तिवारी “भावुक” दिल्ली

Email

रिमझिम बूँदें

उमड़े – घुमड़े काले बदरा,
नैनों में मुस्काए कजरा,
सावन की रिमझिम बूँदों से
भीगे तन – मन,भीगे अँचरा।

बिजुरी चमके , बदरी छाई,
पावस से भीगी अमराई,
श्याम रंग की अपनी सजनी
धानी चूनर में शरमाई।

बालों में सज गया है गजरा,
नैनन से झाँके है कजरा,
सरगम सुन करके बूँदों की
सुमनों पर मंडराए भँवरा।

शिव – गौरा की पूजा करते,
मनचाहा वर माँगा करते,
कजरी गा – गा झूला झूलें
मोर – पपीहा नर्तन करते।

मौसम ने ली है अँगड़ाई,
खेतों में फसलें लहराई,
बारिश ने जब मुख को चूमा
“भावुक” महक उठी पुरवाई…

डॉ.अवधेश तिवारी “भावुक”
दिल्ली

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here