काव्यभाषा : अपनाओ कृष्ण को मन से – चरनजीत सिंह कुकरेजा भोपाल

अपनाओ कृष्ण को मन से

बनाओ
कृष्ण को मन से सारथी
और बन जाओ
अर्जुन सा पार्थ..।
करो
अपने भीतर के..
दुराचारी कौरवों से अन्तरयुद्ध….।
भेदों दुनयावी चक्रव्यूहों को..।
प्रतिकार करो
अमानवीय अवांछित विचारों का
और जीत लो सिद्धांतों की लड़ाई।

असत्य पर सत्य की जीत
होती है कदम-दर-कदम…
लेकिन उसके लिये
आवश्यक है..
हमारा कृष्ण को
मन से आत्मसात करना…।
कृष्ण
जो स्वयं हैं सर्वेश्वर का रूप,
कृष्ण
जो रहते हैं कण-कण में
कृष्ण
जो बसते हैं जन-जन में।
सच में…!
यदि हम अपना सकें
पूर्णतः कृष्ण के शाश्वत पदचिन्हों को
तो कोई वजह नही
कि उनके गीतोपदेशों का
अनुसरण करते हुए
हम फोड़ न सकें
ख्वाहिशों के पिरामिड पर चढ़ कर
अपने-अपने नसीब की हाँड़ी..।
और अंत मे पा न सकें
अपने हिस्से का माखन..।

अपनाना है अगर
सचमुच हमें कृष्ण को
तो
जगानी होगी ह्रदय में
परहितों की सात्विक भावनाएं
बनाने होंगे सुदामा से मित्र।
और
सीखनी होगी प्रेम की वो इबारतें
जिनकी दीवानगी में डूब कर
मीरा ने विष को भी
अमृत समझ कर पी लिया था..।
सच में…!
कृष्ण
मूर्तियों से निकल कर
हमारे-तुम्हारे सबके दिलों में
साक्षात उतर सकते है..
बशर्ते
हम उन्हें
सिर्फ एक दिन ही नही
अपितु
सदैव ..हर पल
स्मरण करें…
उत्सव मनाएं
आशाएं जगाएं…
अपने कार्यकलापों से
सारा वातावरण महकाएं
हर दिन जन्माष्टमी मनाएं…।
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चरनजीत सिंह कुकरेजा
भोपाल

1 COMMENT

  1. जन्माष्टमी मनाने के औचित्य को परिभाषित करती हुई बहुत ही सुन्दर संदेश देती हुई एक भावनात्मक प्रस्तुति ।

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